जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
जयपुर (संस्कार सृजन) "मातृभाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा दूर नहीं होती'" राजस्थान के लोगों को लंबे समय से मातृभाषा (राजस्थानी) को मान्यता का इंतजार है। यह इंतजार अब उनके दिल में शूल बनकर चुभने लगा है। राजस्थान में हिंदी से ज्यादा राजस्थानी भाषा बोलने वाले लोग हैं यदि हम बात करें 2011 की जनगणना में करीब 4 करोड़ लोगों ने अपनी मातृभाषा राजस्थानी लिखवाई है जो हिंदी से ज्यादा हैं इसमें हर जिले के आंकड़े हैं हालांकि, हमारा हिंदी से कोई विरोध नहीं है। लेकिन हम चाहते हैं कि राजस्थानी भाषा का अब तक जो नुकसान हुआ है। उसकी भरपाई होनी चाहिए। सरकार हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए दुबारा अध्यादेश लाती है तो भी हम विरोध नहीं करेंगे, लेकिन राजस्थानी को भी उसका हक मिलना चाहिए। इतने सालों में हमारी संस्कृति का नाश हो रहा है बच्चे लोकगीतों का अर्थ नहीं जानते हैं, जबकि राजस्थानी के बिना हमारी शादी नहीं हो सकती, बाकि कोई रीती-रिवाज भी राजस्थानी के बिना पूरे नहीं हो सकते हैं।
यूनेस्को ने विश्व में भाषायी और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देने के लिए 1999 में 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मानाने की स्वीकृति दी थी। लेकिन आठ करोड़ से अधिक आबादी वाले राजस्थान की पीड़ा यह है कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह नहीं मिलने से इसे वह हक नहीं मिल पाया है। जिसकी यह भाषा हकदार है।
यदि हम राजस्थानी भाषा की संवैधानिक स्थिति की बात करें तो राजस्थान के एकीकरण से पहले 1952 में एक अध्यादेश जारी हुआ कि प्रांत की भाषा हिंदी होगी। उसके बाद जब राजस्थान बन गया तब गवर्नर गुरुमुख निहाल सिंह ने एक अध्यादेश जारी किया कि प्रांत की भाषा हिंदी रहेगी। संवैधानिक प्रावधान है कि किसी भी अध्यादेश को छह महीने में विधानसभा से अनुमोदन करवाना होता है। उस समय राजस्थान में साक्षरता का आंकड़ा महज आठ फीसदी था। इसका मतलब यह है कि 92 फीसदी लोग राजस्थानी भाषा बोलते थे। तमाम पहलुओं पर गौर करें तो 1957 में राजस्थानी भाषा को प्रदेश की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिल जाना चाहिए था, लेकिन अब तक राजस्थानी भाषा को यह अधिकार नहीं मिला। राजस्थानी सबसे पुरानी और सबसे समृद्ध भाषा है हर तरह का साहित्य राजस्थानी भाषा में रचा गया है वीर रस, शृंगार रस, वात्सल्य रस, भक्ति रस जैसे सभी रसों में रचनाओं का एक विपुल कोष है जो साहित्य के हर मापदंड पर खरी उतरती हैं पद्य, गद्य, उपन्यास, कहानी और वार्ता जैसी विधा में साहित्य रचना की गई है फिर भी आज तक मान्यता की राह देख रहे हैं यह हम सबके लिए सोचनीय विषय है।
मुझे लगता है राजस्थानी को मान्यता नहीं मिलने का एक बड़ा कारण राजस्थान की राजनीति में बैठे बड़े बड़े कद्दावर नेताओं में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है इसके चलते राजस्थान की युवा पीढ़ी को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। बहुत से युवा राजस्थानी पढ़ना चाहते हैं लेकिन जब वे आगे भविष्य की तरफ नजर उठाते हैं तो सोचते हैं कि इसमें नौकरी की जगह नहीं है जबकि राजस्थानी को मान्यता मिलने पर प्रदेश के लोगों को ज्यादा अवसर मिलेंगे।
राजस्थानी भाषा की मान्यता का मुद्दा लंबे समय से अटका है। केंद्रीय साहित्य अकादमी, यूजीसी, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, आकाशवाणी-दूरदर्शन, भाषा की सभी अकादमियों ने राजस्थानी को मान्यता दे रखी है सरकार को भी इसे आठवीं अनुसूची में जोड़ना चाहिए अब तो डबल इंजन की सरकार है केंद्र सरकार इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करे और प्रदेश की सरकार इसे द्वितीय भाषा के रूप में स्वीकृति दे यह केवल साहित्यकारों की मांग नहीं है बल्कि यह मुद्दा रोटी और रोजगार से जुड़ा है यह संस्कृति, संस्कार और परंपराओं से जुड़ी मांग है। हमारा राजस्थान प्रदेश कोई भूभाग का टुकड़ा मात्र नहीं है। परंपरा, भाषा और संस्कृति ही प्रदेश को एकीकृत राजस्थान बनाती है। इनके बिना प्रदेश को राजस्थान कहने में भी हमें संकोच होगा। राज्य सरकार से भी मांग है कि राजस्थानी को द्वितीय भाषा के रूप में मान्यता दी जाए ताकि नई शिक्षा नीति को सही तरीके से लागू किया जा सके। इससे राजस्थान में बड़ी संख्या में निरक्षर होने का दाग भी मिट सकेगा मातृभाषा पढ़ाने का माध्यम होगा तो प्रांत में कोई भी अनपढ़ या निरक्षर नहीं रहेगा। विकास के सारे रास्ते खुल जाएंगे।
राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की पहल पर मुख्य सचिव सुधांश पंत ने भारत सरकार को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने गृह सचिव गोविंद मोहिल से राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सिफारिश की है। मुख्य सचिव ने पत्र में लिखा है कि भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में और भाषाओं को सम्मिलित करने एवं वस्तुनिष्ठ मानदंड तैयार करने के लिए सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश में विभिन्न भाषाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए पात्र बताया गया है। समिति की सिफारिश गृह मंत्रालय में विचाराधीन है वहीं, राजस्थानी भाषा को अब तक भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया इसलिए राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की कार्यवाही के संबंध में यथोचित आदेश प्रदान किए जाए।
गौरतलब है कि राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का संकल्प विधानसभा 3 सितंबर 2003 को पारित कर चुकी है। अब भारत सरकार के स्तर पर मंजूर किया जाना रह गया है। राजस्थान सरकार ने काम शुरू कर दिया है। उम्मीद है अगले साल तक मुहर लग सकती है। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए वर्षों से मांग उठती रही है। कई बार आंदोलन भी हो चुका है। अब सरकार इस विषय पर काम कर रही है। मातृभाषा राजस्थानी का मुद्दा प्रदेश की अस्मिता और जनभावना से जुड़ा है राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से राजकाज सुगम हो जाएगा शिक्षा मंत्री की पहल जल्द रंग ला सकती है।
दरअसल काफ़ी अर्से बाद प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा केन्द्र सरकार को ऐसा पत्र लिखा जाना राजस्थानवासियों के लिए यह एक बड़ी खुशखबरी है। वैसे भी यह राजस्थान का दुर्भाग्य ही है कि राजस्थान विधानसभा द्वारा 25 अगस्त 2003 को सर्वसम्मति से पारित लिए गए संकल्प के बावजूद विगत 21 वर्षों से केन्द्र सरकार के पास यह विषय लंबित पड़ा हुआ है। इस संकल्प में राजस्थान के सभी जिलों में बोली जाने वाली उप भाषाओं को (भारतीय भाषायी सर्वेक्षण एवं प्रमाणिक जनगणना आंकड़ों अनुसार) ‘राजस्थानी’ में समाहित किया हुआ है। संसद के दोनों सदनों राज्य सभा और लोकसभा में प्रदेश के सांसदों एवं राज्य विधानसभा में प्रदेश के विधायकों ने अनेकों बार राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं सूची में सम्मिलित करने की मांग की हैं। इसके अलावा राजस्थान के सभी ज़िलों और देश की राजधानी नई दिल्ली में भी कई बार विशाल धरना एवं प्रदर्शन किए गए हैं तथा समय-समय पर राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, केन्द्रीय गृह मन्त्री और अन्य केन्द्रीय मंत्रियों को ज्ञापन दिये गये हैं। इसके अभाव में राजस्थान में नई शिक्षा नीति का लाभ भी मातृभाषा राजस्थानी को नही मिल पा रहा है,जबकि केन्द्र सरकार द्वारा पारित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चों को अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देने के प्रावधान अनुसार राजस्थानी भाषा को प्रदेश की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिये जाने की माँग निरन्तर की जा रही हैं।
मायड़ भाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता के इस संवेदनशील मामले के समाधान से करोड़ों लोगों का केंद्र के प्रति विशेष कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रति सम्मान बढ़ेगा |
इन सभी तथ्यों के आधार पर अब देखना है कि देश विदेश में दस करोड़ से भी अधिक लोगों की धड़कन राजस्थानी भाषा को संविधानिक मान्यता का सोभाग्य कब मिलेगा?अब यह भी देखना है कि क्या आज़ादी के अमृत काल में राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता के साथ अपना गौरव हासिल होगा? साथ ही राजस्थानी को प्रदेश की दूसरी राजभाषा का दर्जा कब तक मिलेगा? यह देखना भी सुखदायी होगा।
लेखक : डॉ. राकेश वशिष्ठ
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