अहिंसा के प्रचारक महावीर :डॉ. श्रीनिवास महावर

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

जयपुर (संस्कार सृजन) जनमत मंच के तत्वाधान में महावीर जयंती पर विशेष कार्यक्रम विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ. श्रीनिवास महावर ने बताया कि महावीर जयंती जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक है, जो अहिंसा, शांति और संयम का प्रतीक है। 

इस दिन अहिंसा परमो धर्म: के संदेश के साथ प्रभात फेरी, शोभायात्रा और मंदिरों में विशेष पूजा होती है। यह आत्म-शुद्धि, दया और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे, जिन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वैसे जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे।

भगवान महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व (विक्रम पूर्व 542) बिहार में वैशाली के कुंडग्राम में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ शाही क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। भगवान महावीर ने 30 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन और अपने बड़े भाई नंदीवर्धन की आज्ञा से राज का त्याग कर ज्ञान प्राप्ति के लिए संन्यास लिया था। 

जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने की कई तरह की साधनाएं बतायी जाती है। कैवल्य ज्ञान को बौद्ध धर्म में संबोधी, निर्वाण या बुद्धत्व प्राप्त करना माना जाता है और हिंदू धर्मानुसार इसे समाधि का उच्च स्तर या मोक्ष कहा जा सकता है।

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान महावीर स्वामी को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उस वक्त उनकी उम्र 42 वर्ष की थी। भगवान महावीर स्वामी को ज्ञान (कैवल्य) बिहार के जृम्भिकग्राम (या ज्रिम्भिकग्राम) गाँव के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर प्राप्त हुआ था। यह ज्ञान उन्हें 12 साल की कठोर तपस्या के बाद एक साल के वृक्ष के नीचे 42 वर्ष की आयु में मिला था। 

कैवल्य ज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने जनकल्याण के लि उपदेश दिया। वे जैन धर्म के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थंकर माने गए। महावीर स्वामी ने 12 साल तक मौन तपस्या तथा गहन ध्‍यान किया। अन्त में उन्हें 'कैवल्य ज्ञान' प्राप्त हुआ।  उन्होंने 'कैवल्य ज्ञान' की जिस ऊंचाई को छुआ था वह अतुलनीय है। मोक्ष की धारणा वैदिक ऋषियों से आई है। 

भगवान बुद्ध को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन साधना में बिताना पड़ा। महावीर को कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करनी पड़ी और ऋषियों को समाधि (मोक्ष) प्राप्त करने के लिए योग और ध्यान की कठिन साधनाओं को पार करना पड़ता है। 

अतः मोक्ष को प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। मोक्ष प्राप्त करने से व्यक्ति जन्म मरण के चक्र से छुटकर भगवान के समान हो जाता है। मोक्ष मिलना आसान नहीं। दुनिया में सब कुछ आसानी से मिल सकता है, लेकिन खुद को पाना आसान नहीं। खुद को पाने का मतलब है कि सभी तरह के बंधनों से मुक्ति।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. विनय कुमार भारद्वाज ने बताया कि अहिंसा के तीन  प्रकार है- मन, वचन और कर्म । यह जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इस अवसर पर हेमंत कुमार डामोर ने जैन धर्म और प्रकृति से संबंधित चर्चा की। साथ ही धर्मेंद्र कुमार वर्मा एवं आजाद कुमार , मीणा ने जैन धर्म की शिक्षाएँ-

1. सत्य (Truth): हमेशा सच बोलना और झूठ से दूर रहना।

2. अस्तेय (Non-stealing): चोरी न करना। बिना दी गई वस्तु को ग्रहण न करना।

3. ब्रह्मचर्य (Chastity): इन्द्रियों को वश में रखना और काम वासनाओं का त्याग करना।

4. अपरिग्रह (Non-possession): धन या भौतिक वस्तुओं का संचय न करना और अनावश्यक वस्तुओं का त्याग करना। 

5 .  अहिंसा: किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुँचाना, यह जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्धांत है। आदि पर बल दिया। 

इस अवसर पर डॉ. संजय कुमार मीणा, डॉ .जिज्ञासा पटीदार , हेमराज गुर्जर डॉ. समा राम देवासी आदि ने भी अपने विचार रखें। मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया कि इन व्रतों के साथ ही, जैन धर्म में सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चरित्र (त्रिरत्न) तीन रत्न (त्रिरत्न) माने गए हैं, जो मोक्ष प्राप्ति का मार्ग हैं और 72 वर्ष की आयु में, 468 ईसा पूर्व में, पावापुरी (बिहार) में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

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