अहीर रेजिमेंट की क्यों उठ रही है मांग, क्या है सेना में इतिहास

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी

जयपुर (संस्कार सृजन) इन दिनों अलग-अलग स्तर पर सेना में अहीर रेजीमेंट की मांग उठ रही है। 15 मार्च को सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने संसद में इसकी मांग उठाई थी। वहीं आज मध्य प्रदेश के कांग्रेस के नेता अरुण यादव ने भी इसकी मांग की। आखिर क्यों हो रही है बार-बार अहीर रेजीमेंट की मांग और सेना में इसका इतिहास क्या है?

रेजिमेंट यानी सेना की टुकड़ियां
भारतीय सेना में अलग-अलग रेजिमेंट हैं। हालांकि यह व्यवस्था सिर्फ थल सेना में ही है। वायु सेना या नौसेना में ऐसा कोई इंतजाम नहीं है। आपने भी कई नाम सुने होंगे मसलन-सिख रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट, मराठा रेजिमेंट वगैरह-वगैरह। यह एक तरीके से सेना टुकड़ियां होती हैं। इन सभी टुकड़ियों को मिलाकर सेना कंप्लीट होती है। सेना में रेजिमेंट का बंटवारा ब्रिटिश काल में ही हुआ था। तब अंग्रेजों ने आवश्यकतानुसार अलग-अलग ग्रुपों में सेना में भर्ती की। कभी यह भर्तियां जाति के आधार पर हुईं तो कभी समुदाय के आधार पर। फिर इसी बेस पर रेजिमेंट बन गई। थलसेना में भी इंफेंट्री में ही यह रेजिमेंट देखने को मिलती है।

अंग्रेजों की शुरू की गई परंपरा

जब अंग्रेज भारत में आए तो वो अपनी फौज लेकर नहीं आए थे। व्यापार से शुरुआत करने के बाद वह लोग सेना बनाने लगे। इसके बाद वह यहीं के लोगों को सेना में भर्ती करने लगे। 1857 की क्रांति के बाद जाति के आधार पर रेजिमेंट का जोर बढ़ने लगा। अंग्रेजों ने प्रिफरेंस उन जातियों को दी, जो पहले से युद्ध में हिस्सा लेती आ रही थीं। इन्हें मार्शल और नान मार्शल के आधार पर बांटा गया। मार्शल के तौर पर राजपूत, राजपूत , सिख, गोरखा, डोगरा, पठान, बलोच को सेना में शामिल किया गया। इस कैटेगरी के लोग लड़ाइयों में हिस्सा लेते थे। अंग्रेज इन सैनिकों के चयन के वक्त जाति पर इस वजह से जोर देते थे, जिससे उन्हें पता रहे कि लड़ाई में उनके लिए कौन बेहतर भूमिका निभाएगा। 

जाति के नाम रेजिमेंट, लेकिन जरूरी नहीं कि उसी जाति की भर्ती हो
यह तो बात हो गई ब्रिटिश काल की बात। आजादी के बाद भी यह सिस्टम बना रहा, लेकिन उसके बाद से अभी तक जाति के आधार पर कोई नई रेजिमेंट नहीं बनी है। वहीं यह भी जरूरी नहीं कि जाति के नाम पर रेजिमेंट बनी है तो सिर्फ उसी जाति के लोगों का सेलेक्शन हो। राजपूत रेजिमेंट में गुर्जरों की भर्ती भी हो सकती है मुसलमानों की भी। वहीं कई फोर्स ऐसी हैं जहां कोई जाति व्यवस्था नहीं है। 

रेजांग ला की लड़ाई से ऐसा है अहीर रेजिमेंट का ताल्लुक

रेजांग ला की लड़ाई में 117 अहीर सैनिकों की शौर्य की चर्चा आज भी होती है। यह सभी जवान कुमाऊं रेजीमेंट की 13वीं बटालियन के हिस्सा थे। इन जवानों की वीरता के सामने चीन के सैनिकों को झुकना पड़ा था। इसके बाद भारतीय सेना ने रेजांग ला चौकी बचा ली थी। इस लड़ाई में 120 सैनिकों ने चीन के 400 सैनिकों को मार गिराया था। वहीं 117 जवान शहीद हो गए थे जिसमें 114 अहीर थे। 


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