जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
उत्तर प्रदेश (संस्कार सृजन) पूर्वी उत्तर प्रदेश में ठंडी के दिनों में खेतों में एक पौधा साग पाया जाता था। आलू ,मटर,गेहूं आदि के बीच यह स्वयं ही उग आता था। अवधी में इसे बथुई अथवा बथुआ कहते है। अब भी कहीं कहीं देखने मिल जाता है। बथुई के साथ उड़द की दाल बनाई जाती। जिसे सकपहिता कहा जाता। चूंकि शीत ऋतु में यह स्वयं उग आती । इसलिए यह उसी मौसम में बनाई जाती। मेथी से मिलती जुलती शकल है इसकी। इसको खाने का आंनद ही कुछ और था। मुझे लगता है इसकी तासीर गर्म ही होगी।
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| डॉ. रमाकांत क्षितिज |
प्रकृति में स्वयं से उगने वाले पौधे या फल उस वातावरण के अनुकूल ही होते है। हम जो नैसर्गिक खेती करते है। वह भी इंसानों के अनुकूल ही होती है। ठंडी में आलू,गर्मी में गेहूं,बरसात में धान यहाँ तक की साग सब्जियां भी। तो मैं सकपहिता के बारे में बता रहा था।
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| बेटी मुक्ति का बनाया सकपाहिता |
सकपहिता में बथुई के साथ जब उड़द को मिला कर पकाया जाता। तो दोनों के मिलन से जो खुशबू आती घर महक उठता। उड़द और बथुई के इस मिलन में हींग बहन बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती उनके बिना यह मिलना सम्भव ही न था।
यही समझो फ़िल्म " नदिया के पार ' की , अगर "गुंजा" बथुई थी तो, उड़द, "चंदन ", हींग, "भौजी "। इन तीनों व अन्य कुछ कलाकारों को मिलाकर जो सकपहिता बनता, तो उस ज़माने में भी करोड़ों का कारोबार न सही,पर करोड़ो को अपने स्वाद से मोह लेता। थाली में जब इसे भोजन की प्रतीक रोटी, के भीतर समाकर खाने वाला, निवाला होठों के बीच से होते ,जैसे ही जीभ देखते इस पर तुरन्त टूट पड़ती। जीभ की ततपरता देखकर दांत भाई, जीभ बहन की मदद में आ जाते।
दोनों भाई बहन मिलकर इसे वही सज़ा देते,जो कभी अकबर ने अनारकली को दिया था, ठीक उसी तरह इसे पेट के भीतर भेज देते है। बच्चें जब इसे सुबह ,अपनी अपनी थाली में ,भात के साथ मिलाकर अपने अपने बनाएं ईंट के चूल्हे पर जब सकपहिता भात की थाली को आग पर रखते। कुछ गर्मी पाने के बाद यह छंन्न छंन्न की आवाज करता। एक विशेष प्रकार की खुशबू से घर महक उठता।
सकपहिता का यह रुप और गंध जिसने देखा और चखा हो वह कम भाग्यशाली नही। कभी कभी आग की कुछ राख भी इस व्यंजन को सर्वोत्तम बनाने में सहायता करती। सकपहिता जैसा स्वाद और बासी सकपहिता की महक की कोई तुलना नही। दाल बहनों की तरह प्रयोग में लाया जाने वाला सकपहिता ठंडी के मौसम की सबसे बड़ी सौगात था।
लेख - डॉ. रमाकांत क्षितिज
हम सभी किसी ना किसी रूप में जरूरतमंदों की सेवा कर सकते हैं | पड़ोसी भूखा नहीं सोए इसका ध्यान रखें |
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