शिक्षक-दिवस विशेष : शिक्षक ही खड़ा होगा

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

सफ़लता के गीत का मुखड़ा जब गढ़ा होगा, हो न हो, अंतरे की बुनावट में तब शिक्षक ही खड़ा होगा। यही अटल सत्य है। यही नित्य है, इसमें कोई संदेह नहीं। किसी बच्चे की आँखों में जब पहली बार कोई सपना जन्म लेता है, तो वह सपना अभी इतना छोटा होता है कि उसे स्वयं भी पता नहीं होता कि उसे एक दिन आसमान छूना है। उसकी उँगली पकड़कर उसे अक्षरों से परिचित कराने वाला, उसके भीतर जिज्ञासा जगाने वाला और उसकी लड़खड़ाती कोशिशों को हौसले में बदलने वाला कोई होता है, और वो है- शिक्षक।


सफलता जब मंच पर खड़ी होकर तालियाँ बटोरती है, तब दुनिया अक़्सर केवल सफल व्यक्ति को देखती है। कोई डॉक्टर की उपलब्धि गिनता है, कोई इंजीनियर की कामयाबी पर गर्व करता है, कोई प्रशासनिक अधिकारी की तस्वीर साझा करता है, कोई वैज्ञानिक की उपलब्धि को देश की शान बताता है। मगर उस सफलता के पीछे लिखी कहानी के पन्ने पलटें तो कहीं न कहीं एक शिक्षक की स्याही जरूर मिलेगी। क्योंकि सफलता का गीत भले विद्यार्थी के नाम से गाया जाए, उसकी धुन में शिक्षक की साधना छिपी होती है। शिक्षक केवल किताब का पाठ नहीं पढ़ाता। वह जीवन पढ़ाता है। वह बताता है कि हार अंतिम सत्य नहीं है, असफलता कोई स्थायी पता नहीं है और कठिनाइयाँ रास्ते की दीवार नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को मजबूत करने वाली सीढ़ियाँ हैं। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को यह नहीं सिखाता कि केवल परीक्षा में अच्छे अंक कैसे लाने हैं, वह यह सिखाता है कि जीवन की परीक्षा में स्वयं को कैसे संभालना है। 

शिक्षक की डाँट उस समय कठोर लगती है, लेकिन वर्षों बाद वही डाँट अनुशासन की आवाज बनकर भीतर गूँजती है। उसकी कही छोटी-सी बात उस समय सामान्य लगती है, मगर वही बात किसी मोड़ पर निर्णय लेने की ताकत बन जाती है। शिक्षक का विश्वास विद्यार्थी को उस समय थाम लेता है, जब विद्यार्थी स्वयं पर विश्वास खो चुका होता है। असल में यही तो शिक्षकत्व है- विद्यार्थी के भीतर उस संभावना को देख लेना, जिसे वह स्वयं अभी देख नहीं पा रहा। आज जब शिक्षा भी बाज़ार, प्रतिस्पर्धा और परिणामों के दबाव से घिरी हुई है, तब शिक्षक की भूमिका और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। उसे पाठ्यक्रम भी पूरा करना है, तकनीक के साथ कदम भी मिलाना है, बदलती पीढ़ी को समझना भी है और संस्कारों की वह लौ भी जलाए रखनी है, जिसके बिना ज्ञान अधूरा है। वो इसलिए, क्योंकि, डिग्री रोजगार दे सकती है, लेकिन दृष्टि जीवन देती है।

कौशल अवसर दे सकता है, लेकिन संस्कार दिशा देते हैं। ज्ञान बुद्धिमत्ता बढ़ा सकता है, लेकिन चरित्र मनुष्य बनाता है, और इन तीनों के बीच सेतु बनकर खड़ा होता है- शिक्षक।

विडंबना यह है कि शिक्षक की सफलता का कोई तत्काल उत्सव नहीं होता। वह अपने विद्यार्थियों को आगे बढ़ते देखता है और स्वयं पीछे खड़ा रह जाता है, इसलिए तो कहावत बनी है- "चेला चीनी बनता है, गुरु गुड़ ही रहता है।" विद्यार्थी की सफलता पर मंच सजता है, सम्मान मिलता है, अखबारों में तस्वीर छपती है, शिक्षक अक़्सर केवल मुस्कुराकर इतना कहता है- मुझे मालूम था, तुम कर सकते हो। उस एक वाक्य में वर्षों की तपस्या होती है। एक शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार उसका विद्यार्थी होता है। जब वर्षों बाद कोई विद्यार्थी लौटकर कहता है- “सर, आपकी वह बात आज भी याद है...” या “मैडम, अगर आपने उस दिन मुझे नहीं रोका होता तो...” तब शिक्षक समझ जाता है कि उसकी मेहनत व्यर्थ नहीं गई। दरअसल, शिक्षक बीज बोता है और अक़्सर किसी दूसरे मौसम में किसी दूसरे व्यक्ति के रूप में उसका वृक्ष देखता है। वह छाया देता है, फल देता है, पर अपने नाम का बोर्ड कभी नहीं लगाता। शायद यही शिक्षक की महानता है। आज समाज को केवल सफल लोगों की कहानियाँ नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानियाँ भी सुनानी चाहिए जिन्होंने सफल लोगों को गढ़ा है। 

हमें डॉक्टर के साथ उसके शिक्षक का नाम याद रखना चाहिए, वैज्ञानिक के साथ उसके गुरु की भूमिका स्वीकार करनी चाहिए, कलाकार के साथ उसके मार्गदर्शक को सम्मान देना चाहिए और हर उपलब्धि के पीछे खड़ी उस अदृश्य शक्ति को पहचानना चाहिए, जिसे हम शिक्षक कहते हैं। क्योंकि जब कोई विद्यार्थी गिरकर उठता है, तो उसमें शिक्षक की सीख होती है। जब वह असंभव को संभव करने का साहस करता है, तो उसमें शिक्षक का विश्वास होता है। जब वह सफलता के बावजूद विनम्र रहता है, तो उसमें शिक्षक के संस्कार होते हैं। इसलिए अगली बार जब किसी सफलता का जश्न मनाएँ, तो केवल विजेता को मत देखिए। उस हाथ को भी तलाशिए जिसने कभी उसकी कॉपी पर लाल निशान लगाया था, उस आवाज़ को भी याद कीजिए, जिसने कहा था—“और बेहतर कर सकते हो”, उस व्यक्ति को भी नमन कीजिए जिसने विद्यार्थी की असफलता में भी उसकी संभावना देखी थी। आखिर में, लेकिन आख़िरी नहीं, एक बार फिर शिक्षक के सम्मान में एलान कर रहे हैं- सफ़लता के गीत का मुखड़ा भले किसी विद्यार्थी के नाम से लिखा जाए, पर उसकी हर पंक्ति में शर्तिया किसी शिक्षक की मेहनत होगी। तालियाँ भले सफल व्यक्ति के लिए बजें,

मगर उन तालियों की प्रतिध्वनि में निश्चित ही शिक्षक की तपस्या होगी। और जब इतिहास किसी सफल इंसान की कहानी लिखेगा, तब संभव है कि उसका नाम सबसे ऊपर हो, लेकिन उस कहानी के अंतरे की बुनावट में, हो न हो,

शिक्षक ही खड़ा होगा..!!

डाॅ. जितेन्द्र लोढ़ा - स्वतंत्र लेखक, प्रेरक वक़्ता, स्तंभकार व काॅलेज शिक्षा राजस्थान में टीचर एजुकेटर है।


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