भावनाओं के सैलाब में डूबता विवेक - महेन्द्र सिंह कटारिया

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संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी 

नीमकाथाना (संस्कार सृजन) आज सोशल मीडिया विचारों की अभिव्यक्ति का सबसे व्यापक और प्रभावशाली मंच बन चुका है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने विचार, अनुभव, ज्ञान, भावनाएँ तथा रचनात्मक अभिव्यक्तियाँ कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब, टेलीग्राम, ब्लॉग, पॉडकास्ट तथा विभिन्न ऑनलाइन मंच और फोरम इसके प्रमुख माध्यम हैं।

शैक्षिक दृष्टि से भी सोशल मीडिया अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। पोस्ट लेखन, ब्लॉग लेखन, वीडियो संदेश, ऑडियो संदेश (पॉडकास्ट), ई-पत्रिकाएँ, वेबिनार, लाइव सत्र, ऑनलाइन चर्चा समूह, डिजिटल पोस्टर तथा इन्फोग्राफिक्स जैसे माध्यम ज्ञान के प्रसार और संवाद को नई दिशा प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार सोशल मीडिया विचारों के आदान-प्रदान, जन-जागरूकता और रचनात्मक अभिव्यक्ति का सशक्त साधन बन गया है।

किन्तु इसके साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी तेजी से उभर रही है। अनेक लोग बिना तथ्यों की सत्यता की जाँच किए, केवल भावनाओं, पूर्वाग्रहों अथवा क्षणिक आवेग के प्रभाव में आकर अनर्गल और अप्रासंगिक टिप्पणियाँ कर देते हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं में न तो तर्कसंगत आधार होता है और न ही सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध।

ऐसे लोग किसी विषय की वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक संदर्भों अथवा उसके व्यापक प्रभावों को समझने का प्रयास नहीं करते। वे प्रायः भीड़ का अनुसरण करते हुए या अपनी व्यक्तिगत धारणाओं को अंतिम सत्य मानकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। परिणामस्वरूप सार्थक संवाद की अपेक्षा विवाद, भ्रम और कटुता का वातावरण निर्मित होने लगता है।

आज के डिजिटल युग में प्रत्येक विद्यार्थी और नागरिक के लिए यह आवश्यक है कि वह सोशल मीडिया पर प्राप्त होने वाली किसी भी जानकारी को बिना सत्यापन के सत्य न माने। किसी समाचार, वीडियो, चित्र अथवा संदेश को साझा करने से पहले उसके स्रोत की विश्वसनीयता की जाँच अवश्य करनी चाहिए। गलत या भ्रामक जानकारी न केवल समाज में भ्रम फैलाती है, बल्कि कई बार व्यक्तियों और समुदायों की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुँचा सकती है।

सोशल मीडिया का सर्वोत्तम उपयोग तभी संभव है, जब इसे ज्ञानार्जन, सकारात्मक संवाद, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक जागरूकता के साधन के रूप में अपनाया जाए। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपनी भाषा में शिष्टता, विचारों में संतुलन और व्यवहार में जिम्मेदारी बनाए रखें। असहमति व्यक्त करते समय भी मर्यादा और सम्मान का पालन करना एक जागरूक नागरिक का गुण है।

इसके विपरीत विवेकशील और जागरूक व्यक्ति तथ्यों, अनुभवों तथा तर्कों के आधार पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। वे जानते हैं कि किसी भी विषय पर मत व्यक्त करने से पूर्व उसके विभिन्न पक्षों को समझना आवश्यक है। इसलिए जब वे आधारहीन टिप्पणियाँ देखते हैं, तो सहज ही समझ जाते हैं कि ऐसी प्रतिक्रियाएँ ज्ञान और विवेक से नहीं, बल्कि अज्ञान और आवेग से प्रेरित हैं।

वस्तुतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सार्थक बनती है, जब उसके साथ विवेक, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो। सोशल मीडिया पर शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि विचारों की परिपक्वता ही व्यक्ति के व्यक्तित्व और चरित्र की वास्तविक पहचान होती है। भावनाओं और बुद्धि के बीच संतुलन बनाए रखना ही स्वस्थ समाज, सकारात्मक संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों की सुदृढ़ आधारशिला है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सोशल मीडिया को केवल प्रतिक्रिया देने का मंच न मानें, बल्कि सीखने, समझने और समाज को बेहतर बनाने का माध्यम बनाएं। जब अभिव्यक्ति के साथ सत्य, संवेदना और विवेक का समन्वय होगा, तभी सोशल मीडिया वास्तव में ज्ञान, संवाद और सामाजिक विकास का सशक्त उपकरण सिद्ध होगा।

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