वरिष्ठ गांधीवादी बाल विजय का 100 की उम्र में हुआ निधन

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

वर्धा / पवनार (संस्कार सृजन) प्रख्यात गांधीवादी चिंतक, खादी सेवक और विनोबा परंपरा के अग्रणी कर्मयोगी आचार्य बालविजय (100 वर्ष) का 18 मार्च को निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार परमधाम मुद्रणालय, पवनार परिसर में किया गया। बालभाई के निधन की जानकारी ब्रह्म विद्या मंदिर, पवनार एवं खादी-मिशन सेवा ट्रस्ट, वर्धा द्वारा दी गई। उनके निधन से खादी जगत, सर्वोदय कार्यकर्ताओं और गांधीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त है। उनके जीवन का हर क्षण समाज सेवा, अहिंसा और ग्रामस्वराज के लिए समर्पित रहा।

एक शतायु तपस्वी का प्रेरणादायी जीवन :-

आचार्य बालविजय का जन्म 26 फरवरी 1926 को महाराष्ट्र के भंडारा जिले में हुआ था। उनके पिता माधवराव टेंभेकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े जागरूक और समाजनिष्ठ व्यक्ति थे। बाल्यकाल से ही उन्हें अध्यात्म, देशभक्ति और सेवा के संस्कार मिले। यही संस्कार आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बने। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय में एमएससी की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे जीवन के उद्देश्य की खोज में थे। इसी दौरान 1953 में बिहार में चल रही आचार्य विनोबा भावे की भूदान यात्रा के संपर्क में आए। यह मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर स्वयं को पूर्णतः विनोबा जी के विचारों और कार्यों को समर्पित कर दिया।

भूदान से खादी मिशन तक : सतत पदयात्रा का जीवन-

बालविजयजी ने आचार्य विनोबा भावे के साथ देशभर में पदयात्राएं की और भूदान, ग्रामदान, संपत्तिदान तथा सर्वोदय जैसे विचारों को समाज में स्थापित करने का कार्य किया। वे केवल विचारों के प्रचारक ही नहीं, बल्कि उनके जीवंत साधक थे। जब विनोबा ने क्षेत्र संन्यास लिया, तब बालविजय उनके निजी सचिव बने और 15 नवंबर 1982 को विनोबा के ब्रह्मनिर्वाण तक उनके साथ रहे। इस दौरान उन्होंने विनोबा के चिंतन को व्यवस्थित रूप से समाज तक पहुंचाने का कार्य किया। सन् 1981 में विनोबा द्वारा स्थापित खादी मिशन के वे संयोजक बने। इस भूमिका में उन्होंने खादी आंदोलन को नई ऊर्जा दी और इसे केवल वस्त्र उत्पादन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान और ग्राम स्वराज के प्रतीक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

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