हिंदू नववर्ष हम हिन्दुओं के लिए एक खास पर्व

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

जयपुर (संस्कार सृजन) पतझड़ के बाद जैसे बसंत के बहार की खुशी होती है,ठीक वैसे ही चैत्र मास आते ही हमें हिन्दू नववर्ष के आगमन की खुशी चारों ओर दिखाई देने लगती है। हिंदू नववर्ष महज एक औपचारिकता नहीं है बल्कि हम हिन्दुओं के लिए एक खास पर्व है जिसमें स्वयं मातारानी अपना आशीर्वाद देने आती है। आधुनिक युग में ये हिंदू नववर्ष को लेकर कहीं कहीं ये भ्रांतियां भी है कि इसमें होने वाले आयोजन राजनीति और सामाजिक दिखावा है। इसका सबसे बड़ा कारण है आंग्ल नववर्ष के प्रति होड़ में होने वाले जश्न।


माना सभी धर्म समान है लेकिन अपनी संस्कृति को भूलकर आगे बढ़ना ये कहां की समझदारी है। हिंदू नववर्ष कितना उत्साह और नई ऊर्जा लेकर आता है | हमें इस बात से परे सोशल मीडिया पर कैसे लोकप्रियता पाई जाए इस बात की दौड़ लगी है।

चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा हिन्दू नववर्ष, हिंदुओं के लिए वो खास दिन है जिसमें स्वयं मातारानी अपना आशीर्वाद देने आती है और इसी दिन से शुरू होते है नवरात्रि के वो नौ दिन जहां सनातन संस्कृति में कन्याओं को देवी माना जाता है, देवी स्वरूप उनकी पूजा की जाती है। एक ओर जहां बेटियों को कोख में ही मारने की नीति अपनाई जा रही है वहीं दूसरी ओर हमारी संस्कृति में आज भी इन्हीं बेटियों को पूजकर उनसे सुख- समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद ले रहे है।

इस दिन यहां मंदिरों से होकर मोहल्लों में निकलने वाली धार्मिक शोभा यात्रा और सचेतन झांकियों का मतलब कोई सोशल मीडिया दिखावा या राजनीति उद्देश्य नहीं है बल्कि इस शोभा यात्रा में सजी झांकियों से आज की युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और संस्कारों से रूबरू करवाना है, धर्म,रीति, संस्कृति से जोड़े रखना है।

बेशक पाश्चात्य संस्कृति अपनाना गलत नहीं लेकिन अपनी संस्कृति को और अपने धर्म को हीन समझना भी समझदारी नहीं। अगर हम आंग्ल नववर्ष में फिल्मी गानों पर नाच सकते तो अपनी संस्कृति पर भजन आरती करने में शर्म कैसी?ये कहना गलत नहीं होगा कि हम उस सदी के लोग है जहां हमें अपनानी आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति है लेकिन पूजना भगवान श्री राम को है,हमें  दोस्त बनाने है उच्च स्तर के जिनका रहन सहन विदेशी हो, लेकिन हमें तलाश है कृष्ण- सुदामा जैसा दोस्त की। हमें रहना - कमाना विदेशों में है लेकिन तीज़- त्यौहार,उत्सव - महोत्सव इत्यादि पर्व अपनी संस्कृति अपने धर्म के ही अच्छे लगाते।

एक ओर जहां हम अपनी संस्कृति को भूल रहे वही विदेशी मेहमान हमारी संस्कृति को देखने यहां आते और अपने देश जाकर हमारी संस्कृति अपना रहे। मानो ना मानो लेकिन हमें अपने ज्ञान के विकास के लिए आज भी गीता के उपदेश से  ही आगे बढ़ने का हौसला मिलता। लेकिन हमें सबके सामने मंत्रोच्चार और संस्कृत भाषा का प्रयोग करने में शर्म महसूस होती। हमें हिंदी बोलने में असहजता लगती।

हमें बाकी सब रंगों को अपनाने का जुनून सवार है लेकिन भगवा रंग हमें खटकता है। कहने का तात्पर्य बस इतना ही है कि हमें बेशक आगे बढ़ना चाहिए समय के साथ चलना चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति और संस्कारों को भूलकर नहीं। हिन्दू नववर्ष का उत्साह और इसमें अपनी भागीदारी उतनी ही निभाओ जितना बाकी सब चीजों में करते।

आम भाषा में हम अंग्रेजी में वार्तालाप करना पसंद करते,लेकिन क्यों? ऐसा कौनसा दिखावा करने का प्रयास कर हम अपने आप को एक प्रतिष्ठित इंसान बताना चाह रहे?जिसके लिए हम अपने संस्कार संस्कृति तक से समझौता कर रहे।ऐसा कौनसा अच्छा भविष्य देना चाह रहे अपने बच्चों को जिसमें आम बोलचाल में माता पिता को पुकारने के शब्दों के अर्थ का भी अनर्थ निकलता हो।

महसूस करके देखो तो सही जो मिठास जो सुकून मंत्रों के उच्चारण में है,उनसे मिली जिस आत्मा की शुद्धि से है वो दुनियां के किसी कोने में नहीं है।और ये यथार्थ सत्य है।

हिंदू होना शर्म की नहीं गर्व की बात है,

सनातन महज धर्म नहीं एक उच्च स्तर की संस्कृति है,

मंत्रोच्चार महज शब्द नहीं,आत्मा की शुद्धि है,

भगवा रंग महज रंग नहीं, समृद्धि का प्रतीक है।

लेखक : योगेश किराड़ू, बीकानेर, राजस्थान

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