माघ ठंड और स्नान की महत्ता

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

जयपुर (संस्कार सृजन) माघ का महीना अपने साथ एक अलग ही तरह की ठंड लेकर आता है। यह ठंड साधारण नहीं होती-यह असरदार होती है, चमकदार होती है, तीखी और तिक्ष्ण होती है। माघ की ठंड केवल शरीर को नहीं, मन और चेतना को भी छूती है।

भारतीय संस्कृति में माघ मास का विशेष महत्व बताया गया है। एक पौराणिक लोकमान्यता के अनुसार माघ के महीने में सूर्योदय से पूर्व ठंडे जल से स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो हमारी प्राचीन संस्कृति और जीवन-पद्धति का हिस्सा रही है।

यदि हम इस परंपरा को आज के आधुनिक समय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो पाएँगे कि अब बहुत कम लोग इस विधि को अपनाते हैं। वर्तमान पीढ़ी के लिए ये परंपराएँ अक्सर खोखली या अव्यावहारिक प्रतीत होती हैं। जबकि बुज़ुर्ग आज भी इन मान्यताओं पर विश्वास रखते हैं।

दरअसल, इन परंपराओं के पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि गहरे तर्क और वैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं। माघ की शुद्ध ठंड में ठंडे जल से स्नान करने से शरीर का तापमान संतुलित रहता है। यह शरीर को ठंड के प्रति सहनशील बनाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करता है।

आज हम सर्दी से बचने के लिए अत्यधिक ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते हैं। इससे शरीर धीरे-धीरे अकड़न का शिकार हो जाता है। कई बार मामूली गतिविधियों में भी शरीर जकड़ा हुआ महसूस होता है—पैरों में जकड़न, जोड़ों में दर्द और स्नायु-तंत्र में शिथिलता दिखाई देती है।

माघ मास में प्रातःकालीन स्नान की परंपरा इन्हीं समस्याओं से मुक्ति का एक प्राकृतिक उपाय रही है। पहले लोग नदियों, झरनों और प्राकृतिक स्रोतों के शुद्ध जल से स्नान करते थे। वह जल न केवल शरीर को शुद्ध करता था, बल्कि मन और चेतना को भी जागृत करता था।

माघ की ठंड हमें यह सिखाती है कि प्रकृति से लड़ने के बजाय, यदि हम उसके साथ तालमेल बैठाएँ, तो वही ठंड हमारे लिए औषधि बन सकती है।

लेखिका - जया रोहिन, आबूरोड सिरोही, राजस्थान

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