जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
इस शताब्दी का सबसे उन्नत और प्रभावी संचार उपकरण मोबाइल फोन है। जो आम आदमी की जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन चुका है। टेक्नोलॉजी के इस दौर में सभी का मोबाइल से खास लगाव हो चला है। आजकल बच्चे से लेकर बुजुर्ग के हाथों में मोबाइल देखा जा सकता है। इस दौर में ज्यादातर बच्चे मोबाइल फोन की बुरी आदत का शिकार हो गए हैं। जिसके कारण वे मोबाइल के ऊपर निर्भर हो गए हैं। आज के समय में मोबाइल का उपयोग करने की यदि बात की जाए तो 2023 में एक अनुमान के अनुसार 5 बिलियन लोग इसका उपयोग कर रहे हैं ।
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| लेखक : कन्हैयालाल मेवता |
हाल ही में मोबाइल को लेकर ऐसी घटना सामने आई जो किसी भी अभिभावक को सोचने पर मजबूर कर देगी। 9वीं कक्षा की छात्रा को जब मोबाइल पर गेम खेलते देखा तो पिता ने डांट दिया। ऐसे में बेटी ने रात होते ही आवेश में अपने कमरे में जाकर फांसी लगा ली। यह ऐसा कोई पहला मामला नहीं है। देश के हर कोने से ऐसे मामले अक्सर सुर्खियों में आते रहते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।
आज दूसरे की जिंदगी में क्या हो रहा है इसका ब्यौरा सोशल मीडिया से हमें मिल जाता है दूसरे की जिंदगी में दिलचस्पी हमारी खुद की जिंदगी को तहस नहस कर देती है। इससे मानसिक शांति पर बहुत असर पड़ता है। दिन भर में एक व्यक्ति कितना समय मोबाइल चलाने में बीतता है, इसको लेकर एक बड़ी जानकारी सामने आई है। भारत सहित दुनिया भर के मोबाइल यूजर्स ऐप्स पर दिन भर में लगभग 4 घंटे या उससे अधिक समय बिताने की और अग्रसर हो रहे हैं। यह अत्यधिक चिंता का विषय है। अरस्तु ने कहा है कि एक “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।”
मोबाइल के इस्तेमाल से हमारे स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अधिक उपयोग से बच्चों में चिड़चिड़ापन, सर दर्द की समस्या, नेत्र संबंधित समस्या ,अनिद्रा व हृदय संबंधी रोगों की संख्या बढ़ रही है। सोशल मीडिया पर जो भी दिखता है वह वास्तविकता में कोसों दूर होता है। मासूम बच्चों के मानस पटल पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है जो उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में अवरोध डालता है। बच्चों का अपरिपक्व मन जो देखता है उसी पर विश्वास कर लेता है। बच्चे काल्पनिक दुनिया की चकाचौंध में वास्तविकता से दूर रहते हैं और अपने परिवार से कट जाते हैं।
आजकल बच्चों पर मोबाइल की आदत का गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। उन्हें बहलाने के लिए माता-पिता अक्सर मोबाइल का सहारा लेते हैं। वहीं इससे बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर गहरा असर पड़ रहा है। बच्चों के खाने-पीने की आदतें बदल रही हैं। वे सामान्य भोजन से दूरी बनाने लगे हैं। भोजन में अरुचि से उनमें चिड़चिड़ापन पैदा होने लगा है।
एक तीन साल की बच्ची जो दो से तीन महीने की थी, उसमें तभी से मोबाइल देखने की आदत थी। वह बिना मोबाइल देखे खाना नहीं खाती थी, ना हीं मोबाइल देखते वक़्त वह अपने मम्मी-पापा से बात करती थी।
जब स्कूल जाने की बारी आई तब वह मोबाइल स्कूल ले जाने की ज़िद करने लगी। तब उसके माता-पिता उसे अस्पताल लाए। जहां यह पता चला कि बच्ची को मोबाइल की ऐसी लत लग गई थी कि वह बिना मोबाइल देखे सो भी नहीं पाती थी। डाक्टरों ने सलाह दी की बच्ची को आउटडोर गेम खेलने के लिए बाहर ले जाया जाए। उसे पार्क में दूसरे बच्चों के साथ खेलने दिया जाए।
आज के युग में प्रकृति की जगह मोबाइल के दर्शनों ने ले ली है। पेड़ की छांव का अहसास गुम सा हो गया है वह घास पर पैर रखकर स्पूर्ति को महसूस करना मानो सदियों की बात हो चली है। वो तितलियों को पकड़ते हुए भागना मानो एक स्वप्न सा हो गया है ।आज के युग में मां की लोरी की जगह यूट्यूब ने ले ली है। हम प्रकृति से दूर हो गए हैं। खेलना-कूदना तो जैसे बच्चे भूल ही गए, ऐसी स्थिति में माता-पिता का यह कर्तव्य बनता है कि वह बच्चों को प्रकृति का महत्व समझाएं। मोबाइल के कारण बच्चे अपने कार्य स्वयं करने की क्षमता को खो रहे हैं क्योंकि उनको मोबाइल से हर चीज का हल मिल जाता है। किशोर बच्चों के हाथ में मोबाइल की जगह पुस्तक देवें। बच्चों में पढ़ने की आदत डालें। पुस्तक पढ़ने से बच्चों का शब्दकोश बढ़ता है तथा उनके ज्ञान में वृद्धि होती है।
लेखक : कन्हैयालाल मेवता (शहीद उजीन सिंह रा.उ.मा.वि.अर्जुनपुरा,धोद, राजस्थान)
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