जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
"दिव्यांगता अभिशाप नहीं है, यदि सोच सही हो तो अभाव भी विशेषता में तब्दील हो जाता हैं।" इसी चेतना का मर्म व कर्म है- "समावेशी-शिक्षा"। दिसम्बर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांगों को दिव्यांग कहने की अपील की थी, जिसके पीछे उनका समावेशी-शिक्षा सम्बलन स्वरूपी एक सच्चा तर्क था कि शरीर के किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं, इस कारण वे विशेष है, विकलांग शब्द व उनके प्रति दया व लाचारी जैसे अनेक भाव उन्हें हतोत्साहित करते है, यह एक अनुभवजनित मनोवैज्ञानिक सत्य है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1992 में हर वर्ष 3 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के रूप में मनाने घोषणा की गयी, इसका उद्देश्य भी समाज के सभी क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों को बढ़ावा देना और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक जीवन में दिव्यांग लोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। दुनियाँ में 8 प्रतिशत लोग दिव्यांगता के शिकार हैं, यदि इनके प्रति नज़र बदली जाए तो नज़ारा अपने आप बदल जाएगा। जीवन के सभी मंचों पर से इस दिशा की आवाज़ उठायी जाए तो दिव्यांगता कमज़ोरी व अभिशाप नहीं, बल्कि आत्मविश्वास व विकास का जागरण बन जाएगी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाए, तो दिव्यांगता न केवल व्यक्तित्व-विकास में सहायक बन जाती है, बल्कि समाज के लिए भी विकास के लिए नये-नये मानक गढ़ने लग जाती है। दिव्यांग व उनके समकक्ष अन्य विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रकल्प "समावेशी-शिक्षा" है, जिसके चलते आज दिव्यांग न केवल शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं, बल्कि राष्ट्र की उत्पादकता में सक्रिय योगदान देने के पर्याय भी बन रहे हैं, इसलिये शिक्षा की दृष्टि और यह सारी सृष्टि एक हो जाए तो विकलांगता और उसकी सामाजिक-जिम्मेदारी कभी अभिशाप नहीं रहेगी, बस आवश्यकता है, तो केवल दृष्टि बदलने की, सृष्टि तो उसके पीछे-पीछे अपने आप बदल जाएगी |
विकलांगता को लेकर प्रचलित सामान्य नज़रिया :-
1. दयनीय व लाचारी की निगाहें :- आज भी समाज के अधिकांश लोगों द्वारा दिव्यांगों को दयनीय दृष्टि से ही देखा जाता है, भले ही देश में अनेकों दिव्यांगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया हो, मगर लोगों का उनके प्रति वही पुराना नजरिया बरकरार है, बस उसे तोड़ कर, समावेशी-विकास के नज़रिये की ओर मोड़ना है।
2. सामाजिक जागरूकता व जिम्मेदारी के पर्यावरण का अभाव :- आज के समय में भी अधिकतर लोगों को तो इस बात का भी पता नहीं होता है कि हमारे घर के आस-पास कितने दिव्यांग रहते हैं। उन्हें समाज में बराबरी का अधिकार मिल रहा है या नहीं। किसी को इस बात की कोई फिक्र नहीं है। यह एक कड़वा सच यह भी है कि भारत में दिव्यांग आज भी अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए दूसरों पर आश्रित है।
3. सरकारी योजना व नीतियों के प्रति न्यून चेतना :- सरकार द्वारा देश में दिव्यांगों के लिए कई नीतियां बनायी गयी हैं। उन्हें सरकारी नौकरियों, अस्पताल, रेल, बस सभी जगह आरक्षण प्राप्त है। दिव्यांगों के लिए सरकार ने पेंशन की योजना भी चला रखी है। लेकिन ये सभी सरकारी योजनाएं उन दिव्यांगों के लिए महज एक मजाक बनकर रह गयी हैं, जबकि शिक्षा, जागरूकता व सहयोग के अभावों के चलते इनके पास इन सुविधाओं को हासिल करने के लिए दिव्यांगता का प्रमाणपत्र ही नहीं है।
4. शिक्षा के मूल अधिकार व समावेशन के प्रति जागरूकता का अभाव :- शिक्षा अधिकार विधेयक 2009 व समावेशी-शिक्षा के वैधानिक नीतिगत जामा पहनने के बावजूद भी विकलांगो व विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा के प्रति शिक्षा व उसके व्यवस्थागत अंगों व प्रकल्पों में आज भी उदासीनता का साम्राज्य दिखाईं पड़ रहा है ।
5. मानवीय संवेदनाओं का अभाव :- दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों का मजाक बनाना, उन्हें कमजोर समझना और उनको दूसरों पर आश्रित व भार समझना एक भूल और सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है,जो लोग किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाते हैं अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग होते हैं, उनके बारे में हमें यह समझना होगा कि उनका जीवन भी हमारी तरह है और वे अपनी कमजोरियों के साथ उठ सकते हैं, कुछ कर सकते हैं ।
उपर्युक्त प्रचलित वातावरण के आधार पर कहा जा सकता है कि आज आधुनिक होने का दावा करने वाला हमारा समाज अब तक भी दिव्यांगों के प्रति अपनी बुनियादी सोच में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं ला पाया है। अधिकांश लोगों के मन में दिव्यांगों के प्रति तिरस्कार व दया का भाव ही रहता है, और इस प्रकार के भाव व व्यवहार दिव्यांगों के स्वाभिमान पर सदा से ही चोट पहुंचाते आ रहे हैं |
दृष्टि दिशा भी बदल सकती है :-
अब दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच को बदलने का समय आ गया है। दिव्यांगों को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है, जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे। इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है, जिसके चलते हाल के कुछ वर्षों में दिव्यांगों के प्रति सरकार की कोशिशों में तेजी आयी है तथा दिव्यांगों को अधिकतम सुविधाए देने के लिए प्रयास हो रहे हैं।
पिछले दिनों क्रियान्वयन की सुस्त चाल के चलते माननीय सुप्रीम कोर्ट ने फटकार भी लगायी थी। दिव्यांगों को शिक्षा से जोड़ना अब बहुत जरूरी हो गया है। आज भी हालात यह है कि विकलांगता के प्रकारों के लिहाज़ से विशेष स्कूल व व्यवस्थाओं का अभाव है, जिसकी वज़ह से अधिकांश विकलांग ठीक से पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते हैं। शिक्षा अधिकार अधिनियम-2009 व वैश्विक स्तर पर समावेशन-नीति के प्रचलन के चलते अब आशा की किरणें जागी है। शारीरिक अक्षमताओं वाले दिव्य पुरुषों के मानवीय-अधिकार, सामुदायिकता व चिकित्सकीय माॅडलस् के लिहाज़ से सामुहिक दृष्टि व श्रृष्टि मिलकर अब अग्र प्रकार दिव्यांग-उत्थान को दिशा प्रदान कर रही है |
- दिव्यांगता अभिशाप नहीं, समाजिक-जिम्मेदारी है, के विकसित पर्यावरण का प्रचलन।
- शिक्षा अधिकार विधेयक-2009 के चलते शिक्षा अब मूल अधिकार, अतः समावेशन की नीति अब
क़ानूनी।
- शिक्षा व रोजगार आरक्षण के विशेष प्रावधान।
- अवरोध मुक्त पर्यावरण व संसाधनों का विकास ।
- सामूहिक व सहायक प्रयासों को मान्यता ।
- विधिक व नीतिगत पहल।
- वैकल्पिक-शिक्षा के संसाधनों का प्रावधान ।
- आईसीटी व कम्प्यूटरीकृत संसाधनों ने दिव्यांगो के लिए शिक्षा व रोजगार खोले नये मार्ग।
- गैर सरकारी संगठनों के सामुदायिक प्रयास।
- कमियों पर नहीं शक्ति (सबल-पक्ष) पर दृष्टिपात ।
दिव्यांग-सबलता के उपर्युक्त अक्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि अब अपूर्णता नहीं पूर्णता का क्षितिज दिखलाई पड़ रहा है, आइए उसका अभिनंदन किया जाए | (ये लेखक के अपने विचार हैं)
लेखक : डाॅ. जितेन्द्र लोढ़ा (स्वतंत्र लेखक, काॅलेज शिक्षा राजस्थान में टीचर एजुकेटर हैं)
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