शाक्त स्थल है अम्बा का सतबहिनी मंदिर

जीवन अनमोल है इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !

सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !

संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी

बिहार (संस्कार सृजन) बिहार राज्य का औरंगावाद जिले के अम्बा की माँ सतबहनी आस्था का प्रतीक है । चिल्हकी अंबा से दक्षिण मुख्य मार्ग पर अवस्थित सत बहिनी मां मंदिर की सती माई मंदिर एवं सती स्थान के नाम से ख्याति है।


सतबहनी मंदिर के गर्भगृह में स्थित स्वर्णकार की पत्नी सती स्थल वटवृक्ष की छया में थी । चिल्हकी की जमींदार महाराजा ने बटवृक्ष की छया में सती होने वाली स्थान से प्रभावित हुए थे । महाराजा के ज्येष्ठ पुत्र सरयू चेचक से ग्रस्त होने से आंखों की ज्योति से वंचित होने को थे, तब न जाने कौन सी आंतरिक प्रेरणा के वशीभूत होकर उनके पिता ने सती स्थान के पास मनौती मांगी कि यदि मेरे पुत्र की आंखें ठीक हो जाए और रौशनी वापस हो जाए तो मैं आपके लिए मंदिर बनवाउंगा तथा आपकी सेवा करूंगा। 

लोग कहते है कि चमत्कार हो गया और धीरे-धीरे उनके पुत्र की हालत सुधरने लगी। उनकी आंख ठीक हो गई कृतज्ञता वश पूर्व जमींदार ने मिट्टी के पिंड वाले सती स्थान पर वट वृक्ष की छाया तले मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें 7 देवी पिंडों की स्थापना की गई थी । सतबहिनी मंदिर का निर्माण कर सात बहन एवं भैरो बाबा के पिंड की स्थापना वेदी पर है। ठीक उसके ऊपर मां की चांदी की धातु से प्रतीकात्मक स्वरूप बना है। पूर्व में यहां जिस बरगद के नीचे मां की वेदी दक्षिण भारतीय वास्तुकारों ने प्रतिकृति के रूप में उकेरा है। दूसरे तल पर मां दुर्गा, हनुमान जी, गणेश जी एवं भगवान शिवलिंग की स्थापना राजस्थान के जयपुर से लाकर लगाई गई है। सफेद संगमरमर से बनी ये प्रतिमाएं मन मोहित करनेवाले हैं। दक्षिण भारत के कि वास्तुकारों ने नागर एवं द्रविड़ शैली के मिश्रण से अद्वितीय मंदिर का रूप दिया है। गुम्बद में नागर शैली का प्रतीकात्मक स्वरूप को स्थान दिया गया है। वास्तुकारों ने मंदिर के आधार भाग को वर्गाकार बनाया है। वहीं गर्भगृह के उपर का चारों ओर का भाग पिरामिड नुमा है जिससे द्रविड़ शैली का आभास होता है। मंदिर नवीनतम स्थापत्य कला  है। 

सतबहिनी से फसल की अच्छी उपज की कामना करते हैं। धन-धान्य से किसान आद्रा नक्षत्र में मां सुखी बनाने हेतु मां की वेदी पर चुनरी चढ़ाते हैं। नारियल की बलि देकर देवी की बलि प्रथा का  पालन किया जाता है। भव्य मेले में आसपास के जिले के अलावा झारखण्ड, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों के  श्रद्धालु  पहुंचते हैं। चैत्र एवं अश्विन शुक्ल  नवमी एवं विजया दशमी को मां सतबहिनी मंदिर में अवस्थित माता सतबहिनी एवं बाबा भैरव की उपासना की जाती है। परिवार के साथ आकर मां के चरणों में नारियल प्रसाद व चुनरी समर्पित की जाती है ।

लेखक :  सत्येन्द्र कुमार पाठक

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