जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
भीलवाड़ा (संस्कार सृजन) प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की ओर से शाहपुरा के गांधीपुरी स्थित राजयोग सेवा केंद्र में गीता जयंती पर संगोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें शाहपुरा के विभिन्न संगठनों से जुड़े बुद्विजीवी लोगों ने भाग लिया।
भीलवाड़ा सेवा केंद्र की ब्रकु इन्दिरा दीदी मुख्य वक्ता के रूप में संगोष्ठी में शामिल हुई तो अतिथि के रूप में आरएसएस के जिला संघचालक शंकरलाल तोषनीवाल, प्रांतीय बौद्विक प्रमुख सत्यनारायण कुमावत, भीलवाड़ा सेवा केंद्र के ब्रकु अमोलक भाई व शाहपुरा सेवा केंद्र की संचालिका ब्रकु संगीता बहन मौजूद रही। शाहपुरा सेवा केंद्र की संचालिका ब्रकु संगीता बहन के स्वागत भाषण से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
मुख्य वक्ता भीलवाड़ा सेवा केंद्र की ब्रकु इन्दिरा दीदी ने कहा कि संसार के सभी साधनों का एक ही उद्देश्य होता है। अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर जाना, व्यतिक्रम से विन्यास की ओर जाना। इन्दिरा दीदी ने कहा कि गीता मनुष्य जीवन की दिशा निर्देशिका है। यदि हम गीता के ज्ञान को सच्चे अर्थों में समझ कर उसे अपने जीवन में धारण करें तो हमारी विजय निश्चित है। दीदी ने कहा कि हम सब परम पिता परमात्मा की श्रेष्ठ सन्तान हैं। हमें कभी नकारात्मक विचार मन मस्तिष्क में नहीं लाने चाहिए। हमारा जीवन अमूल्य है और हमें परमात्मा की बताई राह पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि सकारात्मक सोच से हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि परमात्मा सर्वज्ञ है और हम आत्माएं अल्पज्ञ हैं। अल्पज्ञ, सर्वज्ञ को तब तक नहीं जान सकता जब तक सर्वज्ञ अपना परिचय स्वयं न दे। परमात्मा परम, सर्वोच्च और सर्वमान्य है। परमात्मा का सत्य स्वरूप हमें जानना चाहिए।
इस अवसर पर ब्र.कु. संगीता बहन ने मुस्कराने का मंत्र बताया कि जीवन में कुछ भी ऊपर नीचे हो रहा हो, आप सब अपने आप से प्रतिज्ञा करें कि चाहे कुछ भी हो जाए अपने भीतर के आनंद को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं है। सदा यही सोचे ‘मैं आनंदमय हूं’। इसे अपने जीवन का मंत्र बना लें। संचालन संगीता बहन ने किया। अमोलक भाई ने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी दी।
प्रांतीय बौद्विक प्रमुख सत्यनारायण कुमावत ने कहा कि संसार के मोह के कारण मनुष्य में क्या करूं इस दुविधा में फंस कर दुविधा में पड़ जाता है। अतः मोह या सुख शांति के वशीभूत नहीं होना चाहिए। शरीर नाशवान है उसे जानने वाला शरीरी अविनाशी है। इस विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना इन दोनों में से किसी भी एक उपाय को काम में लाने से चिंता शोक मिट जाते हैं। निष्काम भाव से केवल दूसरों के हित के लिए अपने कर्तव्य को निभाते रहने से आप का कल्याण हो जाता है।
आरएसएस के जिला संघचालक शंकरलाल तोषनीवाल ने कहा कि कर्म बंधन से छूटने के दो उपाय हैं। कर्मों के तत्व को जानकर निस्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्वज्ञान का अनुभव करना। मनुष्य को अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर सुखी दुखी नहीं होना चाहिए। इनसे सुखी दुखी होने वाला मुझसे संसार से ऊंचा उठकर परम आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। किसी भी साधन से अंतकरण में समता आने चाहिए। संमता आए बिना मनुष्य सवर्था निर्विकार नहीं हो सकता । सब कुछ भगवान का ही है ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है। अंतकालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है। अतः मनुष्य को हर दम भगवान का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। जिससे अनंत काल में भगवान की याद बनी रहे सभी भगवत प्राप्ति के अधिकारी हैं। चाहे वह किसी भी जाति धर्म ने देश के क्यों ना हो।
रिपोर्ट : मूलचन्द पेसवानी
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