भाजपा की नंबर वन दौड़ में तेजस्वी का तेज - संजय एम. तराणेकर

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संस्कार न्यूज़ @ राम गोपाल सैनी / ( संजय एम. तराणेकर- कवि, समीक्षक व स्तंभकार)


(संस्कार न्यूज़ ) पहले चरण के चुनाव में जिस तरह का उत्साह वोटरों ने दिखाया है उससे यह उम्मीद बंधती हैं कि आम मतदाता सरकार चुनने में कोई गलती नहीं करेंगे। लगभग 54 प्रतिषत वोटरों ने अपने अधिरकार का उपयोग किया है। जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत हैं। बावजूद इसके बिहार विधानसभा 2020 के चुनाव अब रोमांचक मोड़ पर पहुंच चुके हैं और अब यह लगभग तय होचुका है कि लालू के बेटे तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल एवं बीजेपी के बीच ही विधानसभामें नंबर वन पार्टी होने की होड़ है।



नीतीश बाबू एवं सुशील मोदी द्वारा चिराग पासवान कोमुख्यधारा से अलग करने का प्रयास कहीं नीतीश पर एवं भाजपा के लिए उड़ता तीर ना साबित होजाए, क्योंकि 2015 विधानसभा के चुनावों में 95 लाख लगभग वोट प्राप्त करके भी सिर्फ 53 सीटें ही जीत पाई थी। वहीं दूसरी ओर 70 लाख वोटों के साथ राष्ट्रीय जनता दल ने 81 तथा 64लाख वोटों के साथ नीतीश बाबू की जनता दल युनाइटेड ने 71 सीटें जीतकर महागठबंधन की सरकार बनाई थी। राजद के साथ पटरी न बैठ पाने के कारण नीतीश सुशासन बाबू ने भाजपा के साथ फिर हाथ मिलाकर एनडीए की सरकार बनाई थी। वर्तमान में स्थितियां इस तरह है कि अगरबिहार की जनता विशेषकर युवा वर्ग जो मोदी से बहुत ही प्रभावित रहा है। उसकी दुखती नब्ज पर तेजस्वी ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का ब्रह्मास्त्र चला दिया है वहीं नीतीश व भाजपा के लिए उड़ता तीर साबित हो रहा है। ऊपर से चिराग पासवान ने अपनी लोक जनशक्ति पार्टी के लगभग 150 उम्मीदवारों के साथ जिसमें 30-32 बेहद ही मजबूत उम्मीदवार माने जा रहे हैं को खड़ाकरके नीतीश को परेषान अवष्यही किया है। चिराग यदि इनमें से 20 सीटें भी जीत लेते हैं तोउनकी उपस्थिति में वजन अवश्य ही रहेगा।




तेजस्वी यादव की रैलियों में जिस तरह से भीड़ आ रही हैं। उनकी तुलना लालू यादव के स्टाईल से की जा रही है। लालू भी आम आदमी की भाषा का इस्तेमाल अपने वोटरों को लुभाने के लिए किया करते थे। यदि तेजस्वी की भीड़ वोटों में तब्दिल होती हैं तो यह बिहार के इतिहास में एक चमत्कारिक चुनाव होगा। इसमें कोई शक नहीं। क्योंकि वे अकेले ही एनडीए के कुनबे से लडाई लड़ रहे है। कांग्रेस का साथ उन्हें जिस तरह से मिलना चाहिये था, वह नहीं मिल पा रहा है। राहुल के स्टार कैम्पेनर वह नहीं कर पा रहे है। जो उन्हें करना चाहिये था। इतना तो साफ हो चला हैं कि नीतिश कुमार को मोदी का साथ मिल रहा हैं इसलिए ही वे मजबूती से खडे़ हैं। भले ही उनका मुख्यमंत्री बनना तय हो, परंतु यदि भाजपा की सीटें ज्यादा आती हैं तो वे दबाव में
अवश्य ही होंगे।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना हैं कि भाजपा अपने को महाराष्ट्र की तरह नंबर वन बनाने के लिए कृतसंकल्पित है। उसका फोकस उसके द्वारा लड़ी जा रही 115 सीटों में से अधिकांश को जीतने का लक्ष्य हैं। मोदी से ज्यादा योगी आदित्यनाथ की सभाएँ भी बहुत कुछ स्पष्ट करती है। राजनाथ सिंह, शाहनवाज हुसैन से लेकर स्मृति इरानी तक भाजपा ने सबको लगा रखा है। सर्वे भी कह रहे हैं कि भाजपा बड़ी पार्टी बनकर उभरने का अनुमान हैं। क्योंकि भाजपा लगभग 65 से 75, जनता दल युनाइटेड लगभग 45 से 55, अन्य लगभग 10 से 15 सीटें जीतने की स्थिति में है। यूं भी नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह धीरे-धीरे भाजपा को युवाओं के नेतृत्व वाली पार्टी बनाने की दिशा में जबर्दस्त रूप से अग्रसर है। ये तय है कि इस बार टक्कर जबर्दस्त है। संभवतः यह नीतिश कुमार का आखिरी चुनाव भी। क्योंकि अब बिहार भी युवा तरूणाई की ओर देख रहा है। जिसमें तेजस्वी की बड़ी भूमिका होगी। फिर चाहे सरकार किसी की भी बने मगर विपक्ष बहुत ही मजबूत होगा, बिहार विधानसभा में जिससे बिहारियों का भला होना तय है।


इधर चिराग के लिए भी ये चुनाव अग्नि परीक्षा साबित होंगे जो ये तय करेंगे कि वे अपने पिता रामविलास पासवान के उत्तराधिकारी के रूप में कैसे स्थापित होते हैं। क्योंकि अभी तक लोकजनशक्ति पार्टी जिस तरह के दावे करती आ रही है उसमें वे सफल नहीं हुए है। ये अवसर है चिराग के लिए स्थापित होने का। पासवान के जाने के बाद उन्हें कितनी सहानुभूति मिली ये तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। फिल्मो में तो वे अपना कॅरियर नहीं बना सकें परंतु उनके पास यहॉ पर अपनी छवि और आमजन के दिलों में पैठ बनाने का अच्छा अवसर हैं। वे नीतिश को ही निशाना बना रहे है, परंतु उन्हें इसमें कितनी सफलता मिलती है यह आने वाला समय बताएगा। क्योंकि वे भी एनडीए का हिस्सा रहे हैं। सरकार चाहे तेजस्वी की हो या नीतीश बाबू की उन्हें किंगमेकर का ताज हासिल होता हैं या नहीं।


तेजस्वी को हर हाल में मुख्यमंत्री बनने के लिए 90 सीटों का आंकड़ा पार करना ही होगा। अगर वो नोटबंदी, जीएसटी, कोरोना महामारी, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को भुनाने में कामयाब हुए तो राष्ट्रीय जनता दल को वे लालू की अनुपस्थिति में फिर खड़ा करने में कामयाब होंगे। देखा जाये तो आने वाले 9 नवंबर को 31 साल का हो रहा यह युवा इतिहास भी रच सकता है। अब देखना यह है कि 10 नवंबर को तेजस्वी को जन्म-दिन का क्या तोहफा मिलता हैं।  (ये लेखक के अपने विचार हैं)


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