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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

उत्तर प्रदेश (संस्कार सृजन) उत्तर प्रदेश में लगातार गहराता एलपीजी संकट अब केवल घरेलू रसोई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। भारतीय समाज में विवाह केवल एक पारिवारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरा का प्रतीक होता है। ऐसे में जब रसोई गैस की किल्लत बढ़ती जा रही हो, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है-शादियों में भोज कैसे होगा?

विवाह समारोहों में सैकड़ों मेहमानों के लिए भोजन तैयार करना एक बड़ी व्यवस्था होती है, जो मुख्यतः एलपीजी पर निर्भर रहती है। गैस सिलेंडर की समय पर आपूर्ति न होने से कैटरिंग सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। कई स्थानों पर आयोजकों को अतिरिक्त खर्च कर ब्लैक में सिलेंडर खरीदने पड़ रहे हैं, तो कहीं लकड़ी और कोयले का सहारा लिया जा रहा है। इससे न केवल लागत बढ़ रही है, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और समयबद्धता पर भी असर पड़ रहा है।

इस संकट का सीधा प्रभाव मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जो सीमित बजट में शादियों का आयोजन करते हैं। पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे ये परिवार अब गैस संकट के कारण और अधिक आर्थिक दबाव में आ गए हैं। कई लोगों को अपने कार्यक्रम छोटे करने या मेन्यू में कटौती करने जैसे कठिन निर्णय लेने पड़ रहे हैं।

सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन इस गंभीर स्थिति को समझ रहा है? शादियों का मौसम पहले से तय होता है, और ऐसे समय में गैस की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक असंतोष को भी जन्म दे सकता है।

समाधान के तौर पर सरकार को आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना होगा, साथ ही वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे बायोगैस या इलेक्ट्रिक कुकिंग को बढ़ावा देना होगा। इसके अलावा, बड़े आयोजनों के लिए विशेष कोटा या अस्थायी आपूर्ति व्यवस्था भी की जा सकती है, ताकि ऐसे महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यक्रम बाधित न हों।

अंततः, शादियों का भोज केवल भोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यदि LPG संकट इसी तरह गहराता रहा, तो यह केवल रसोई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हमारी परंपराओं और सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित करेगा। इसलिए अब समय है कि इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए त्वरित और ठोस समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं। (ये लेखक के अपने विचार हैं )

लेखक : सिद्धार्थ गोरखपुरी

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