सिस्टम से हारता बेरोजगार - कविता

जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

बेरोजगारी केवल एक शब्द नहीं है,

यह भीतर लगातार उठती वह टीस है

जो इंसान को हर दिन थोड़ा-थोड़ा तोड़ती है।

कभी लगता है-हम किस देश में जी रहे हैं,

जहाँ व्यवस्था नहीं,

बल्कि अराजकता की गुलामी को सामान्य मान लिया गया है।

सरकारें बदलती हैं,

नियम बदलते हैं,

और उनके साथ बदल जाते हैं

सत्ता के गलियारों में बैठे चेहरे।

लेकिन नहीं बदलता तो

बेरोजगार का जीवन-

जिसकी उम्र, ऊर्जा और आत्मसम्मान |

हर बदलाव के साथ थोड़ा और घिसता चला जाता है।

बेरोजगारी को अक्सर

“बढ़ती जनसंख्या” का परिणाम बताकर

सरकारें और अधिकारी

अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।

यह तर्क जितना आसान है,

उतना ही कायरतापूर्ण भी।

अगर जनसंख्या ही समस्या है,

तो सवाल यह है-

क्या नीतियाँ, भर्तियाँ और योजनाएँ

जनसंख्या को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं?

या फिर जनसंख्या का बहाना बनाकर

व्यवस्था की विफलता छुपाई जाती है?

आज स्थिति यह है कि

भर्तियाँ निकलती हैं,

लेकिन वे केवल फ्रेशर के लिए होती हैं।

जो वर्षों से तैयारी कर रहे हैं,

जो उसी क्षेत्र में दक्षता हासिल कर चुके हैं,

उन्हें सिर्फ उम्र के नाम पर

लाइन से बाहर कर दिया जाता है।

कई जगह आयु सीमा हटाने की घोषणाएँ होती हैं,

लेकिन चयन प्रक्रिया इतनी संकीर्ण रखी जाती है

कि आयु पार कर चुके उम्मीदवार

काग़ज़ों में योग्य होकर भी

वास्तविकता में अयोग्य बना दिए जाते हैं।

प्रश्न सीधा है-

क्या वर्षों का अध्ययन,

लगातार परीक्षाएँ,

और विषय पर पकड़

सिर्फ इसलिए व्यर्थ हो जाती है

क्योंकि उम्र सरकारी फॉर्म में फिट नहीं बैठती?

और फिर उस व्यक्ति से पूछा जाता है-

“अब क्या करोगे?”

मानो इतना पढ़-लिखकर

उसका भविष्य

दिहाड़ी मज़दूरी तक ही सीमित होना चाहिए।

यहाँ सवाल और तीखा है-

क्या किसी बोर्ड अध्यक्ष,

किसी सचिव,

या किसी नेता के बेटे को

इसी कसौटी पर आँका जाता है?

क्या उनसे भी कहा जाता है कि

“अब उम्र निकल गई है,

चाहो तो मज़दूरी कर लो”?

क्या वे अपने बच्चों को

कोसों दूर परीक्षा केंद्र भेजते हैं?

क्या वे ट्रैफिक, किराया, ठहरने की चिंता

और परीक्षा से पहले मानसिक अपमान

झेलते हैं?

सच्चाई यह है कि

घोटाले करने वाले

अक्सर वही अधिकारी, कार्मिक और नेता होते हैं

जो पहले से ही सिस्टम के भीतर

अपनी जड़ें जमा चुके होते हैं।

लेकिन सज़ा उन्हें नहीं मिलती-

सज़ा मिलती है उस बेरोजगार युवा को

जो ईमानदारी से

भविष्य का सपना लेकर तैयारी करता है।

लाखों उम्मीदवारों के लिए

भर्ती निकलती है-

ऊँट के मुँह में जीरा जितनी।

परीक्षा केंद्र दे दिए जाते हैं

कोसों मील दूर।

वहाँ पहुँचने तक

शरीर और जेब दोनों टूट जाते हैं।

और फिर एक घंटे की तथाकथित “तपस्या”-

जबकि कई जगह

सीटें पहले से ही बिक चुकी होती हैं।

दूसरी ओर,

जब कोई सरकार

बेरोजगारी कम करने के नाम पर

कुछ युवाओं को

रोज़गार का सामान्य अवसर देती भी है,

तो बदलती सरकारें

उन्हें आतंकवादी की तरह चिन्हित कर

नौकरी से बाहर कर देती हैं।

यह राजनीति नहीं,

राजनीति की गंदगी है।

वोट बैंक के लिए

मीठे वादे किए जाते हैं,

लेकिन सत्ता में आने के बाद

आंदोलन, पीड़ा और चीख-

इन सबसे सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता।

उन्हें तो बस

उन आंदोलनों से

अपने काम का कोई चेहरा चाहिए।

अगर सरकारें वास्तव में न्याय चाहती हैं,

तो उन्हें साफ और ईमानदार नीति बनानी होगी

या तो

आयु सीमा में नए उम्मीदवारों के लिए

अनुभव की स्पष्ट शर्त रखी जाए,

या फिर

आयु पार कर चुके उम्मीदवारों को

उनके अनुभव, दक्षता और क्षेत्रीय विशेषज्ञता

के आधार पर चयन दिया जाए।

यह कोई रियायत नहीं,

यह न्याय का न्यूनतम स्तर है।

क्योंकि बेरोजगारी

सिर्फ नौकरी न मिलने की स्थिति नहीं है 

यह व्यक्ति की पहचान,

उसके आत्मसम्मान

और उसके भविष्य की धीमी हत्या है।

और जब कोई देश

अपनी ही पढ़ी-लिखी आबादी को

इस तरह हाशिए पर धकेल देता है,

तो खतरा बेरोजगारी का नहीं,

बल्कि सिस्टम के नैतिक दिवालियापन का है।

लेखक : जया रोहिन, आबूरोड 


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