मानव शरीर : ऊर्जा, चेतना और संभावनाओं का केंद्र

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

कोटा (संस्कार सृजन) मानव शरीर केवल हड्डी, मांस और रक्त का ढाँचा नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा, चेतना और संकल्प का अत्यंत सूक्ष्म एवं सुव्यवस्थित तंत्र है। भारतीय योग और अध्यात्म परंपरा सदियों से यह मानती आई है कि मनुष्य के भीतर एक ऐसी आंतरिक शक्ति विद्यमान है, जो जागृत होने पर उसके विचार, व्यवहार और कार्यक्षमता को असाधारण स्तर तक पहुँचा सकती है। इसी कारण योग, ध्यान और साधना को आत्म-विकास की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया माना गया है।नियमित ध्यान, प्राणायाम, संयमित जीवनशैली और आत्मचिंतन से व्यक्ति की मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और निर्णय क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। वह तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी संतुलित रहता है और दीर्घकालिक लक्ष्यों पर केंद्रित रह पाता है। यह आंतरिक शक्ति किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास और अनुशासन का स्वाभाविक फल है।


मेरुदंड : मानव देह का शक्ति-स्तंभ :-

भारतीय अध्यात्म-दर्शन के अनुसार मानव देह स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर सहित संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रतिमूर्ति है। शास्त्रों में मानव शरीर की गौरव-गरिमा इसी कारण विशेष रूप से वर्णित है। देह के भीतर स्थित कुछ विशिष्ट केंद्रों को आध्यात्मिक विज्ञान में शक्तिकेंद्र कहा गया है, जिनका आधार मेरुदंड अर्थात रीढ़ है।जिस प्रकार पृथ्वी का आधार मेरु पर्वत माना गया है, उसी प्रकार मानव देह का शक्ति-आधार मेरुदंड है। शिव संहिता और श्रीमद्भागवत में मानव शरीर को ब्रह्मांड का लघुरूप कहा गया है-“यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत्।” अर्थात जो कुछ भूत, वर्तमान और भविष्य में है, वह सब मानव शरीर में निहित है।

आंतरिक ऊर्जा का जागरण : आत्म-विकास का मार्ग :-

योगशास्त्रों के अनुसार मेरुदंड के मध्य स्थित आंतरिक ऊर्जा-शक्ति को चेतना का मूल स्रोत माना गया है। यह शक्ति सामान्य अवस्था में सुप्त रहती है, किंतु अनुशासित साधना से इसके जागरण पर व्यक्ति के भीतर छिपी मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक क्षमताएँ क्रमशः विकसित होने लगती हैं।मानव शरीर में ऊर्जा के प्रवाह के लिए हजारों सूक्ष्म नाड़ियाँ बताई गई हैं, जिनमें संतुलन स्थापित होने पर व्यक्ति की चेतना अधिक जागरूक, स्थिर और रचनात्मक बनती है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी रहस्यमय अनुभव से अधिक व्यक्तित्व-परिष्कार और जीवन-संतुलन है।

षट्चक्र : चेतना-विकास के सोपान :-

मेरुदंड के मार्ग में स्थित ऊर्जा-केंद्रों को चेतना-विकास की सीढ़ियाँ कहा गया है। इन केंद्रों के सक्रिय होने से व्यक्ति में स्थैर्य, आत्मविश्वास, करुणा, विवेक, संकल्प-शक्ति और अंतर्ज्ञान का विकास होता है। परिणामस्वरूप उसका जीवन अधिक मूल्यनिष्ठ, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनता है।

आधुनिक नेतृत्व और साधना : प्रेरक उदाहरण :-

आंतरिक शक्ति और चेतना-जागरण केवल साधु-संतों तक सीमित अवधारणा नहीं है। आधुनिक युग में इसका प्रेरक उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन में देखा जा सकता है। उन्होंने अनेक अवसरों पर स्वीकार किया है कि योग, ध्यान और साधना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।विशेष रूप से केदारनाथ धाम में उनका एकांत साधना-काल, जब वे हिमालय की कठिन परिस्थितियों में ध्यानरत रहे, यह दर्शाता है कि आत्मचिंतन और साधना नेतृत्व क्षमता को और अधिक सशक्त बनाती है। निरंतर वैश्विक सक्रियता और उच्च दायित्वों के बावजूद उनकी ऊर्जा, एकाग्रता और मानसिक स्थिरता इस आंतरिक अनुशासन की प्रभावशीलता को प्रमाणित करती है।

युवा पीढ़ी के लिए संदेश :-

युवा मैनेजमेंट विश्लेषक एवं इंटरनेशनल लाइफ कोच डॉ. नयन प्रकाश गांधी के अनुसार, तकनीकी युग में जहाँ नई पीढ़ी मोबाइल और आभासी दुनिया तक सीमित होती जा रही है, वहाँ आंतरिक जागरण और साधना जीवन से पलायन नहीं, बल्कि उसे अधिक संतुलित और सार्थक बनाने का साधन है।यदि आज का युवा अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचान ले, तो वह न केवल स्वयं को, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी सकारात्मक दिशा दे सकता है। आत्म-जागरण का यह मार्ग व्यक्ति को प्रकाश-पुंज बनने की प्रेरणा देता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं )

लेखक : डॉ. नयन प्रकाश गांधी

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