विज्ञान समिति के दर्शन विज्ञान प्रकोष्ठ के अंतर्गत वार्ता-गोष्ठी का हुआ आयोजन

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

उदयपुर (संस्कार सृजन) विज्ञान समिति के दर्शन विज्ञान प्रकोष्ठ के अंतर्गत “जीवन में त्याग और दान: क्यों और कैसे” विषय पर वार्ता-गोष्ठी का आयोजन संपन्न हुआ।

गोष्ठी के मुख्य वक्ता युवा विद्वान यश जैन ने अपने उद्बोधन में अध्यात्म, नेचरोपेथी एवं पारिवारिक संबंधों के संदर्भ में भौतिक त्याग तथा मानसिक विकारों के त्याग की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आसक्ति-त्याग एवं अपेक्षा-त्याग के साथ किया गया त्याग ही श्रेष्ठ त्याग है और ऐसा दान व्यक्ति को आंतरिक शांति तथा सामाजिक संतुलन की ओर ले जाता है। श्री जैन ने दान के विविध आयामों को जीवनोपयोगी दृष्टि से रेखांकित किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विज्ञान समिति के कुलप्रमुख व संस्थापक डॉ. के. एल. कोठारी ने दान के व्यावहारिक पक्ष पर बल देते हुए कहा कि त्याग केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि अहंकार, लोभ एवं स्वार्थ का भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास एवं समाजहित त्याग और दान के बिना संभव नहीं है। छात्रवृत्ति प्रदान करना भी ज्ञानदान का एक सशक्त रूप है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को यथाशक्ति उत्तम दान एवं विकारों के त्याग की भावना जीवन में अपनानी चाहिए।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ. पारस मल अग्रवाल ने श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक 12.12 का उल्लेख करते हुए कर्मफल-त्याग से प्राप्त शांति पर प्रकाश डाला। साथ ही समयसार शास्त्र की गाथा 38 के आधार पर ट्रस्टीपन (अभिभावकत्व) की भावना को सामाजिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।

मीडिया प्रभारी प्रो. विमल शर्मा ने कहा कि “दान और त्याग का दर्शन समस्त धर्मों का मूल तत्त्व है। हिंदू धर्म में दानं भोगाय नाशाय, जैन दर्शन में परिग्रह-त्याग, बौद्ध परंपरा में दाना पारमिता, इस्लाम में ज़कात, ईसाई धर्म में चैरिटी और सिख परंपरा में सेवा-सभी का उद्देश्य मानव को आत्मकेंद्रितता से ऊपर उठाकर समाज एवं मानवता के कल्याण से जोड़ना है। त्याग केवल छोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि उच्च चेतना को अपनाने की प्रक्रिया है, और दान केवल देने का कर्म नहीं, बल्कि करुणा का सजीव रूप है।”

गोष्ठी का समापन सकारात्मक संवाद, आत्ममंथन एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना के साथ हुआ। गोष्ठी में डॉ. के. पी. तलेसरा, डॉ. आर. के. गर्ग, डॉ. के. एल. तोतावत, डॉ. आई. एल. जैन, डॉ. सुमन कुमार जैन, शांतिलाल भंडारी, अशोक जैन, प्रकाश तातेड़ सहित अनेक गणमान्य सदस्यों की उपस्थिति एवं विचारों से कार्यक्रम विशेष रूप से समृद्ध हुआ।

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