राष्ट्रोत्थान ग्रंथ विमोचन : आज सांस्कृतिक- शैक्षणिक उत्थान की आवश्यकता- राज्यपाल बागड़े

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी        

जयपुर (संस्कार सृजन) राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि भारतीय कला-संस्कृति की जो ताकत है वो हम भूल गए। हमको सांस्कृतिक- शैक्षणिक उत्थान की आवश्यकता है। संघ का कार्य शुरू किया, उससे पहले लोग हिन्दू की बात नहीं करते थे। वो डॉ. हेडगेवार ही थे, जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की बात की। हम विश्वगुरु थे परंतु अब हमें विश्वगुरू फिर से बनना है।

राज्यपाल बागड़े सोमवार को पाथेय कण संस्थान में आयोजित ‘राष्ट्रोत्थान’ग्रंथ के विमोचन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रारंभ में हमें बोलते थे कि हम प्रसिद्धि पराङ्मुख हैं और इसका हमने सालों पालन किया है। देश जो उत्थान हम देख रहा है वो सालों से उसकी प्रक्रिया चल रही है। हम बचपन से गाते थे, बनेंगे हिन्द के योगी, धरेंगे ध्यान भारत का। हम सभी स्वयंसेवकों के मन में सदैव वही भाव रहता है। जहां जहां स्वयंसेवकों को राष्ट्र सेवा का अवसर मिला चाहे कार्य छोटा हो या बड़ा, उन्होंने प्रमाणिकता के साथ किया।

उन्होंने कहा कि संघ के स्वयंसेवकों की प्रामाणिकता ही थी कि पंडित नेहरू ने उनको 1962 में लालकिले पर संचलन के लिए आमंत्रित किया। 1965 में भी शास्त्री ने जहां आवश्यकता पड़ी वहां संघ के स्वयंसेवकों का राष्ट्र के लिए उपयोग किया। भारत की ताकत पूरी दुनिया में बढ़ रही है, हम बचपन से ये कहते थे ताकत बढ़ानी है परंतु ये ताकत हमको किसी को धमकाने या डराने के लिए नहीं बढ़ानी, ये ताकत हमको स्व रक्षा कब लिए बढ़ानी है।

संघ ने शताब्दी वर्ष में पांच क्षेत्रों में काम करने का प्रण किया है- पतंगे

इस अवसर पर संघ के ज्येष्ठ विचारकर रमेश पतंगे ने कहा कि संघ ने शताब्दी वर्ष में 5 क्षेत्रों स्व का बोध, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने का प्रण किया है। संविधान की कम समझ के कारण सभी लोग अधिकारों की बात करते हैं परंतु अपना विचार अधिकारों में स्थान पर कर्तव्यों की बात करता है। कर्तव्य का जागरण समाज में करने की आवश्यकता है, इसके लिए नागरिक कर्तव्यों का पालन। इन विषयों की समझ सभी में विकसित हो उसके लिए इस ग्रंथ की रचना की है। संघ की शक्ति सभी को महसूस हो ऐसी स्थिति अभी है परंतु बुरी घटनाओं को हम रोक सकें। ऐसी शक्ति हमको विकसित करनी है। अभी आसुरी शक्तियां एकत्रित होकर झूठे नैरेटिव देश में चल रही हैं, अमेरिका जैसे देश भारत को महाशक्ति बनने से रोकने के लिए 50 प्रतिशत टैरिफ जैसे कदम उठा रहा है। एक मन, एक विचार, एक संकल्प से खड़े रहकर हमको इन सबसे लड़ना है, ऐसा साहस ईश्वर हमको प्रदान करे।

संघ की 100 वर्ष की यात्रा पुरुषार्थ, परिश्रम से परिपूर्ण व गौरवशाली है- क्षेत्र संघचालक

समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के राजस्थान क्षेत्र संघचालक डॉ. रमेशचन्द्र अग्रवाल ने कहा कि संघ की 100 वर्ष की यात्रा पुरुषार्थ, परिश्रम से परिपूर्ण व गौरवशाली रही है। वे लोग जो भारत को इंडिया बनाये रखना चाहते हैं। कितने ही लोगों ने संघ को समाप्त करने का प्रयास किया है, परंतु समाज के स्नेह, ईश्वरीय अनुकंपा व स्वयंसेवकों के परिश्रम के कारण संघ को यह वर्तमान अवस्था प्राप्त हुई है। अब विभिन्न संस्थाओं, प्रकल्पों के माध्यम से आमजन संघ से जुड़ने को लालायित है। स्वाधीनता से स्वतंत्रता की ओर हम अग्रसर हो रहे हैं। ऐसा आज दिखाई देता है। आज जैसा स्वरूप संघ का दिखाई देता है उसका बीजारोपण 100 वर्ष पूर्व डॉ. हेडगेवार ने किया था। समाज के जिस क्षेत्र में आवश्यकता थी, उस क्षेत्र में जाकर स्वयंसेवकों ने कार्य किया है। जिसके कारण आज समाज में परिवर्तन हमें दिखाई देता है। जिन पंच परिवर्तनों की बात संघ कर रहा है वे सभी स्वयं से प्रारंभ कर समाज आचरण का भाग बनें, राष्ट्रोत्थान ग्रंथ उसके संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी होगा ऐसा मेरा मानना है।

समारोह में राज्यपाल ने ‘राष्ट्रोत्थान’ग्रंथ विमोचन का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने पाथेय भवन में वरिष्ठ प्रचारक माणक के नाम पर कक्ष का उद्धाटन भी किया। 

राष्ट्रोत्थान ग्रंथ – एक परिचय :-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह शताब्दी वर्ष है। संघ की शताब्दी यात्रा में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए हैं। अनेक संघर्षों और आव्हानों का सामना कर संघ ने यहां तक की यात्रा की है। अपने कार्यों और विचारों के माध्यम से संघ समाज में हिंदुत्व की भावना को गहराई से स्थापित करने सफल रहा है। संघ शताब्दी के अवसर पर सामाजिक परिवर्तन के लिए संघ पांच सूत्र प्रस्तुत कर रहा है। सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य और स्व- जागरण परिवर्तन। हिन्दुस्तान प्रकाशन संस्था के विवेक साप्ताहिक की ओर से प्रस्तुत यह विशेष संकलन ग्रंथ, राष्ट्रोत्थान, इन्हीं राष्ट्रीय विचार और उसकी अभिव्यक्ति का एक दस्तावेज है। इस अक्षर यज्ञ में संघ के सर संघ चालक डॉ. मोहन भागवत, दत्तात्रय होसबले, भैयाजी (सुरेश) जोशी व संघ और इस विचार से जुड़े विचारकों से बातचीत और आलेख सम्मिलित हैं। इस पुस्तक में सज्जनशक्ति का जागरण, एकत्रिकरण, पंचसूत्री सभी के लिए-जग के लिए, विकास की अवधारणा, स्वतंत्रता आंदोलन में संघ और उसकी यात्रा, भारतीय मजदूर संघ की यात्रा और श्रम का भारतीय विचार, वनवासी कल्याण आश्रम के कार्य उनकी चुनौतियां, विश्व हिन्दू परिषद और समाज संगठन में योगदान, संघ व तकनीक,वैचारिक उपनिवेशवाद के साथ मुकाबले जैसे विषयों पर आलेख हैं जो संघ और उसके विविध संगठनों के कार्य- विचार के संदर्भ में परिचयात्मक अनुभूति करवाते हैं। 

पुस्तक में 8 विभाग - चिंतन, विचार, समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, नागरी कर्तव्य, स्व जागृति और अग्रणी हैं।  इनमें से पांच विभागों में संघ के पंच परिवर्तन के विषयों के संदर्भ में दृष्टिबोध करवाते विभिन्न आलेख सम्मिलित हैं। जिनमें ऐतिहासिक, समसामयिक और भविष्य की दृष्टि का विश्लेषण है। पुस्तक के अन्तिम और आठवें विभाग अग्रणी में समाज की संरचना में सामाजिक सुधार, स्वदेशी, पर्यावरण, राष्ट्रीय कर्तव्य, कुटुंब व्यवस्था जैसे विषयों में अपनी अपनी भूमिका अनुसार योगदान करने वाले चुनिंदा महापुरुषों के विचार- उनका परिचय दिया गया है। इनमें लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, स्वातंत्रय वीर सावरकर, महात्मा फुले, संत गाडगे बाबा, तुकडोजी महाराज, पंजाबराव देशमुख, श्रीपाद महादेव माटे, राजर्षी शाहू महाराज, स्वामी विवेकानंद, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, श्री नारायण गुरू, रवींद्रनाथ टैगोर, महर्षी धोंडो केशव कर्वे, ठक्कर बापा, डॉ. श्रीधर नातू, कन्हैयाला मुंशी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य विनोबा भावे, भगिनी निवेदिता, सावित्री बाई फुले, मावशी केलकर, डॉ. विलास राव सालुंखे, सयाजीराव गायकवाड, दत्तोपंत ठेंगडी, मोरोपंत पिंगले, दामूअण्णा दाते, भैय्याजी काणे, अनिल माधव दवे, अटल बिहारी वाजपेयी, मधुकरराव लिमये, नाना ढोबळे, सदाशिव कात्रे, हुतात्म बाबू गेनू, अब्दुल कलाम जैसी महान विभूतियां शामिल हैं। यह पुस्तक कुल 402 पृष्ठों में हैं।

रिपोर्ट : आशा पटेल

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