जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
सुबह की शुरुआत माता-पिता के चरण स्पर्श से करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
चौमूं / जयपुर (संस्कार सृजन) अनेकता में एकता और रीति-रिवाजों में विविधता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भारतीय संस्कृति हजारों सालों के बाद, आज भी जीवित है क्योंकि यह हमारी सोच व विचारों का अभिन्न अंग बन गयी है ।
कहते हैं कि वक्त के साथ चीजें बदल जाती हैं लेकिन कुछ चीजें हमारे संस्कारों में इतना रच पच जाती हैं कि हम चाहकर भी उन्हें नहीं बदल पाते और उन्हीं रूढ़ियों को ढोते रहते हैं यही रूढ़ियां जब परम्पराओं के नाम पर जबरदस्ती जनसामान्य के ऊपर थोपी जायें तो यह सामाजिक कुरीतियां बन जाती हैं ।
हमारे देश में ऐसी ही कुछ सामाजिक कुरीतियां हैं जो मुगलों के समय से आज भी चली आ रही हैं और आज के आधुनिक समय में इनका कोई औचित्य नहीं है। सिर्फ सती प्रथा ही ऐसी कुरीति है, जो अंग्रेजों के समय में, राजा राम मोहन राय के प्रयासों से खत्म हो गयी ।
दहेज प्रथा, पर्दा प्रथा, मृत्यु भोज, बाल-विवाह, कन्या भ्रूण हत्या ऐसी कई रूढ़ियां आज भी हमारे सभ्य समाज पर एक काले धब्बे की तरह हैं जो हमारी संस्कृति व जड़ को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं । पर्दा प्रथा, मृत्यु भोज व बाल-विवाह जहां गांव तक ही सीमित रह गये हैं, वहीं दहेज प्रथा व कन्या भ्रूणहत्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते जा रहे हैं। दहेज लेना व देना अपराध है | बाल - विवाह, कन्या हत्या व मृत्यु भोज पर भी आजीवन कारावास व जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन कुछ ग्रामीण इलाकों में और कुछ समुदायों में कहीं चोरी-छुपे और कहीं प्रशासन की नाक के नीचे ही यह सब खुल्लमखुल्ला हो रहा है।
पर्दा प्रथा - भारत देश में पर्दा प्रथा मुगलों के काल में शुरू हुई जब हिंदू महिलायें, मुस्लिम आक्रमणकारियों की गंदी नजर से खुद को बचाने के लिये अपना चेहरा ढंकने लगी थी । उससे पहले किसी भी ग्रंथ में महिलाओं के घूंघट करने का कोई उल्लेख नहीं है । उसके बाद महिलाओं का घूंघट रखना भी एक परम्परा बन गयी और समय के साथ समाज के बड़े-बुजुर्गों ने इसे अपनी इज्जत से जोड़ लिया ।
इस इक्कीसवीं सदी में घूंघट के लिये कोई जगह नहीं है लेकिन आज भी राजस्थान, हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में महिलायें घूंघट रखती हैं और शहरों के कुछ घरों में भी बहूएं जेठ व ससुर के सामने हर समय पल्लू सिर पर रखती हैं ऐसा ना करने पर कुसंस्कारी व कुलच्छनी बोला जाता है । आज के समय में इस सोच को बदले जाने की जरूरत है क्योंकि यह प्रथा बेमानी हो चुकी है।
दहेज प्रथा भारत में लम्बे समय से शादी के बाद बेटियों को गहने और जरूरी सामान देने की व्यवस्था रही है, लेकिन समय के साथ अब यह भी परम्परा बन चुकी है । सम्पन्न लोग दिखावे और रूतबे के नाम पर बेटियों की शादियों में लाखों, करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं जो मां -बाप अपनी बेटियों को दहेज नहीं दे पाते, उनके ससुरालों में उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।
इस वजह से एक गरीब आदमी को भी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिये अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। आज जब देश में 37 करोड़ लोग गरीब हैं और कितने लोगों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती, वहीं शादी में लाखों रुपए कहां से लाए सामाजिक तौर पर इसे तत्काल बंद किया जाना चाहिए ताकि हर माता-पिता कर्ज तले दबकर आत्महत्या नहीं करें और सर उठा कर समाज में इज्जत से जी सके और अपने परिवार का अच्छे से लालन पोषण कर सकें।
लेखक : कालूराम झाझडिया, ग्राम पंचायत अमरपुरा
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