दूल्हे का मुंह काला कर निकाली बिंदोरी, होली पर 150 साल पुरानी परंपरा

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी

सीकर (संस्कार सृजन) घोड़ी पर बैठा दूल्हा, उसके गले में गोबर के उपले (बड़कुलया), आगे-आगे चल रहा डीजे, और गानों की धुन पर नाच रहे लोग ... आप सोच रहे होंगे कि ये किसी दूल्हे की बिंदोरी निकाली जा रही है? ... यह किसी दूल्हे की बिंदोरी नहीं, बल्कि होली पर सीकर के कांवट क्षेत्र में मनाई जानी वाली खास परंपरा है।धुलंडी के दिन स्वांग रचाकर लोगों का मनोरंजन करने की यह परम्परा पिछले 150 सालों से चली आ रही है, जिसे कांवट के लोग आज भी जीवित रखे हुए हैं। इस अनोखी परम्परा और रंगारंग कार्यक्रम को लोग 'ख्याल' नाम से पुकारते हैं।

होली से कई दिन पहले कांवट के लोग 'ख्याल' परंपरा की तैयारियां शुरू कर देते हैं। धुलंडी के दिन इस स्वांग में एक युवक को दूल्हे की तरह सजाकर, सेहरा सजाकर घोड़ी पर पीछे की ओर मुंह यानी उल्टा करके बैठाया जाता है। इसके बाद आगे-आगे चल रहे डीजे और बैंड बाजे के साथ दूल्हे की बिंदोरी होती है। लोगों को हंसाने के लिए दूल्हे के हाथ में झाडू भी पकड़ाई जाती है और दूल्हे के मुंह पर काला रंग लगाया जाता है। कार्यक्रम में सैकड़ों लोग दूल्हे के आगे-पीछे नाचते, मनोरंजन करते हुए पूरे गांव में बिंदोरी निकालते हैं। इसके बाद बिंदोरी गांव के सैनी मोहल्ले में पहुंचती है, जहां 'ख्याल' कार्यक्रम चल रहा होता है। इसके बाद दूल्हे की अच्छी खातिरदारी करते हुए दूल्हा-दुल्हन की शादी कराई जाती है। दूल्हा-दुल्हन द्वारा शादी के मंडप पर लोगों को हंसाने के लिए कॉमेडी की जाती है, जिससे देखकर हर कोई जोर-जोर से हंसने लगता है। शादी में हंसी-ठिठोली देखकर लोग हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं और खूब मनोरंजन करते हैं।

ख्याल कार्यक्रम में कलाकार डाकण बनकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। कार्यक्रम में एक कलाकार डाकण रूप धारण कर स्वांग रचकर कार्यक्रम में पहुंचता है। इस स्वांग को देखकर बच्चों के साथ बड़े-बड़े भी एक बार को तो डर जाते हैं। डाकण को देखते ही बच्चे इधर-उधर भागना शुरू कर देते हैं, जिससे अफरा-तफरी मच जाती है। डाकण बच्चों को रुलाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ती। इस कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ अन्य पेशेवर कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियां देते हैं।

कांवट में कई सालों से चली आ रही इस परंपरा का आयोजन सैनी समाज के लोगों द्वारा किया जाता है। समाज के लोग इस कार्यक्रम में अपनी अहम भूमिका निभाते हुए यह कार्यक्रम करते हैं। गांव के लोग एकजुटता दिखाते हुए इस कार्यक्रम में आते हैं और चंग की थाप पर उम्र को भुलाकर कार्यक्रम का लुफ्त उठाते हैं और नाचते-गाते हैं।सैनी समाज के लोगों का कहना है कि पहले यह आयोजन बड़े-बुर्जुगों द्वारा किया जाता था, लेकिन समय के साथ-साथ 'ख्याल' की जिम्मेदारी अब गांव के अनेक युवा निभा रहे हैं। यह कार्यक्रम लोगों में आपसी भाईचारा पैदा करता है। सभी जाति-धर्म भुलाकर एकजुटता का संदेश देता है।

होली पर्व पर नशे के बढ़ते चलन से लोग परंपरागत होली से दूर होते जा रहे हैं। वर्षों पहले ग्रामीण क्षेत्र में गोबर और कीचड़ के फाग खेलने की परंपरा थी जो अब लुप्त हो गई है। अब रंग गुलाल की होली ही सीमित रह गई है।होली के रंगों का मोह लोगों के दिलों से भले ही दूर हो गया हो, लेकिन आज भी शेखावाटी की धरती पर कई लोक संस्कृतियां और परंपराएं जीवित है, जो यहां की जीवित संस्कृति और आपसी भाईचारे का संदेश देती है। होली पर कांवट की यह परंपरा करीब 150 साल पुरानी मानी जाती है।

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