जीवन अनमोल है , इसे आत्महत्या कर नष्ट नहीं करें !
संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी
चंडीगढ़ (संस्कार सृजन) 34 साल पुराने रोड रेज के केस में पंजाब कांग्रेस के पूर्व प्रेसिडेंट नवजोत सिंह सिद्धू को सुप्रीम कोर्ट ने 1 साल की सख्त सजा सुनाई है। सिद्धू के हमले में एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। कोर्ट ने 4 साल पहले दिए अपने फैसले को ही बदल दिया है। तब उन्हें 1 हजार रुपए का जुर्माने पर छोड़ दिया गया था।
सिद्धूू के पहले आज ही सरेंडर करने वाले थे। इसके लिए वह अमृतसर जाते हुए आधे रास्ते से पटियाला लौट आए थे। हालांकि लीगल टीम से चर्चा के बाद अब सिद्धू सुप्रीम कोर्ट में सजा के खिलाफ क्यूरेटिव पिटीशन फाइल करेंगे। इसके बाद सरेंडर करने के बारे में फैसला लिया जाएगा।
सिद्धू को पंजाब सरकार से 45 पुलिसकर्मियों की सिक्योरिटी मिली थी। सजा होने के बाद उसे भी वापस लेने के आदेश दे दिए गए हैं। सिद्धू कुछ देर पहले पटियाला स्थित अपने घर पहुंचे। हालांकि उन्होंने फैसले को लेकर सिर्फ 'नो कमेंट्स' कहा। ट्वीट के जरिए उन्होंने जरूर प्रतिक्रिया दी। सिद्धू ने कहा कि उन्हें कानून का फैसला स्वीकार है।
24 पन्नों के ऑर्डर में संस्कृत के श्लोक का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धू को सजा के 24 पन्नों के ऑर्डर पर संस्कृति के श्लोक का हवाला दिया है।
“यथावयो यथाकालं यथाप्राणं च ब्राह्मणे।
प्रायश्चितं प्रदातव्यं ब्राह्मणैर्धर्धपाठकै:।।
येन शुद्धिमवाप्रोति न च प्राणैर्विज्युते।
आर्ति वा महती याति न चचैतद् व्रतमहादिशे।।''
इसका मतलब 'प्राचीन धर्म शास्त्र भी कहते रहे हैं कि पापी को उसकी उम्र, समय और शारीरिक क्षमता के मुताबिक दंड देना चाहिए. दंड ऐसा भी नहीं हो कि वो मर ही जाए बल्कि दंड तो उसे सुधारने और उसकी सोच को शुद्ध करने वाला हो. पापी या अपराधी के प्राणों को संकट में डालने वाला दंड नहीं देना उचित है'। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह भी कहा कि इसमें 2 विचार संभव नहीं हैं। हल्की सजा अपराध के पीड़ित को अपमानित और निराश करती है। SC ने कहा कि केवल जुर्माना लगा सिद्धू को कोई और सजा न देने का रहम दिखाने की जरूरत नहीं थी।
सुनवाई-सजा के वक्त हाथी की सवारी कर रहे थे सिद्धू
इस मामले में जिस वक्त सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और सजा सुनाई जा रही थी, सिद्धू महंगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। सिद्धू ने हाथी पर बैठकर प्रदर्शन किया था। सितंबर 2018 में उन्होंने सजा के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर की थी।
27 दिसंबर 1988 को हुआ था बुजुर्ग से झगड़ा
सिद्धू के खिलाफ रोड रेज का मामला साल 1988 का है। सिद्धू का पटियाला में पार्किंग को लेकर 65 साल के गुरनाम सिंह नामक बुजुर्ग व्यक्ति से झगड़ा हो गया। आरोप है कि उनके बीच हाथापाई भी हुई। जिसमें सिद्धू ने कथित तौर पर गुरनाम सिंह को मुक्का मार दिया। बाद में गुरनाम सिंह की मौत हो गई। पुलिस ने नवजोत सिंह सिद्धू और उनके दोस्त रुपिंदर सिंह सिद्धू के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया।
सेशन कोर्ट ने किया बरी, हाईकोर्ट ने दी सजा
इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा। सुनवाई के दौरान सेशन कोर्ट ने नवजोत सिंह सिद्धू को सबूतों का अभाव बताते हुए 1999 में बरी कर दिया था। इसके बाद पीड़ित पक्ष सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंच गया। साल 2006 में हाईकोर्ट ने इस मामले में नवजोत सिंह सिद्धू को तीन साल कैद की सजा और एक लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने जुर्माना लगाकर छोड़ा
हाईकोर्ट से मिली सजा के खिलाफ नवजोत सिद्धू सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई 2018 को सिद्धू को गैर इरादतन हत्या के आरोप में लगी धारा 304IPC से बरी कर दिया। हालांकि IPC की धारा 323, यानी चोट पहुंचाने के मामले में सिद्धू को दोषी ठहरा दिया गया। इसमें उन्हें जेल की सजा नहीं हुई। सिद्धू को सिर्फ एक हजार रुपया जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया।
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