मोदी की इजरायल यात्रा के मायने

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी 

जयपुर (संस्कार सृजन) साल 2017 में पीएम मोदी इजरायल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे उसी दौरे से दोनों देशों के रिश्तों की नई शुरुआत हुई थी साल 2017 के बाद यह उनका पहला इजरायल दौरा है और कुल मिलाकर दूसरा दौरा इस यात्रा को पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और मजबूत होती कूटनीतिक पकड़ के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पीएम मोदी ने पश्चिम एशिया में भारत को एक भरोसेमंद और मजबूत देश के रूप में पेश किया है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के देशों के साथ रिश्तों को नई दिशा दी है। 

यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है। वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने जिन्होंने इजरायल की संसद नेसेट को संबोधित किया पीएम मोदी ने इजरायली संसद को संबोधित करते हुए कहा, "इस प्रतिष्ठित सदन के सामने खड़ा होना मेरे लिए सौभाग्य और सम्मान की बात है। मैं भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर और एक पुरानी सभ्यता के प्रतिनिधि के तौर पर दूसरी सभ्यता को संबोधित करते हुए ऐसा कर रहा हूं। मैं अपने साथ 1.4 बिलियन भारतीयों का अभिवादन और दोस्ती, सम्मान और साझेदारी का संदेश लाया हूं।"

पीएम मोदी हाल ही में जॉर्डन और ओमान की यात्रा कर चुके हैं पिछले साल उन्होंने सऊदी अरब का दौरा किया था जनवरी में अरब देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में आयोजित हुई थी हाल ही में यूएई के राष्ट्रपति भी भारत दौरे पर आए, जिसे काफी महत्वपूर्ण माना गया। भारत पश्चिम एशिया में संतुलित और निष्पक्ष भूमिका निभाता है | 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए आतंकी हमले की प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत निंदा की थी वहीं, भारत इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर दो-राष्ट्र समाधान के अपने रुख पर कायम है और गाज़ा में मानवीय सहायता भी भेज चुका है।

पीएम मोदी के इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच इस बार भी भारत-इजराइल सहयोग का फोकस कृषि, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा पर रहने की उम्मीद है। दोनों देशों के बीच तकनीकी और कृषि नवाचार को लेकर सहयोग और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। सुरक्षा, रक्षा सहयोग, तकनीक, कृषि और व्यापार जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत और अहम समझौते होने की संभावना है। 

पीएम मोदी के हालिया दौरे को लेकर इजरायल के राजनीतिक और मीडिया हलकों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। इजरायल के संसद भवन को तिरंगे की रोशनी से सजाया गया है।  दोनों देश रक्षा संबंधों को सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि संयुक्त उत्पादन और उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। 

रक्षा और सुरक्षा सहयोग, जिसमें भारत की स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली "सुदर्शन चक्र" और इजराइल की आयरन डोम तकनीक पर संभावित सहयोग शामिल है, पर प्रमुखता से चर्चा होने की उम्मीद है। द्विपक्षीय निवेश समझौते और चल रही मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताओं के आधार पर आर्थिक जुड़ाव, नवाचार, व्यापार और निवेश भी एजेंडा में उच्च प्राथमिकता पर रहेंगे। मोदी यरुशलम में नवाचार केंद्रित एक कार्यक्रम में भाग लेंगे और यद वाशेम का संयुक्त दौरा करेंगे।

गाजा और व्यापक पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर चर्चा होने की संभावना है, साथ ही नेतन्याहू के भारत, अरब देशों, अफ्रीकी देशों और भूमध्यसागरीय राज्यों को जोड़ने वाले गठबंधनों के "षट्भुज" के दृष्टिकोण पर भी बात होगी।

मोदी ने कहा कि भारत, इजरायल की तरह, आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी दोहरे मापदंड के लगातार और बिना किसी समझौते के शून्य-सहिष्णुता नीति का पालन करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “आतंकवाद का उद्देश्य समाजों को अस्थिर करना, विकास को रोकना और विश्वास को नष्ट करना है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए निरंतर और समन्वित वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है, क्योंकि कहीं भी आतंकवाद हर जगह शांति के लिए खतरा है।” 

गाजा मुद्दे पर बोलते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि शांति का मार्ग हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन भारत इस क्षेत्र में संवाद, शांति और स्थिरता के लिए इजरायल और दुनिया के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा, “हमारे सभी प्रयास बुद्धिमत्ता, साहस और मानवता से प्रेरित होने चाहिए,” और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समर्थित शांति पहल का समर्थन करते हुए कहा कि यह एक मार्ग प्रदान करती है।

मोदी ने अब्राहम समझौते का भी उल्लेख किया, जिसे भारत ने दृढ़ता से समर्थन दिया था। उन्होंने कहा, “कुछ साल पहले, जब आपने अब्राहम समझौते को संपन्न किया था, तब हमने आपके साहस और दूरदर्शिता की सराहना की थी। यह एक लंबे समय से अशांत क्षेत्र के लिए नई आशा का क्षण था। तब से स्थिति में काफी बदलाव आया है। 

मार्ग और भी चुनौतीपूर्ण है। फिर भी उस आशा को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।”  मोदी की इस यात्रा से संसदीय, राजनयिक और जन-संबंधों को मजबूती मिलने, रणनीतिक साझेदारी के लिए नए लक्ष्य निर्धारित होने और नवाचार, समृद्धि और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की उम्मीद है।

आलेख: डॉ राकेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक

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