स्व.पूनमचन्द भूतोड़िया स्मृति व्याख्यानमाला हुई आयोजित

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी

लाडनूं (संस्कार सृजन) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दक्षिण एशियाई अध्ययन केन्द्र के पूर्व अध्यक्ष प्रो. संजय के. भारद्वाज ने कहा है कि अखंडता भारत का मूल सांस्कृतिक वैभव है, विरासत है। यही सत्य सनातन है, जो भारत को भारत बनाता है। भूखंड के रूप में इसके टूटने और बिखरने की पीड़ा अवश्य रहती है, लेकिन गर्व इस बात का होता है कि इस विखंडन के बाद भी संस्कृति का मूल जीवित रहता है। वे यहां  जैन विश्वभारती संस्थान के महादेवलाल सरावगी अनेकांत शोध पीठ के तहत आचार्य महाप्रज्ञ-महाश्रमण ऑडिटोरियम में आयोजित स्व. पूनमचन्द भूतोडिया स्मृति व्याख्यानमाला में ’अखण्ड भारत: संस्कृति, सम्प्रभुता एव सामर्थ्य’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे थे। 

उन्होंने कहा, प्राचीन विश्व की यह एक मात्र सभ्यता है, जो अपनी आध्यात्मिक सांस्कृतिक विरासत के साथ आधुनिक युग मे भी प्रज्ज्वलित है। सृष्टि के आरंभ से इस पृथ्वी ने अनेक सभ्यताओं को जन्मते, बनते और विच्छिन्न होते देखा है। भारत की अखंडता और इसके सांस्कृतिक स्वरूप को अभी के वातावरण में ठीक से नए विज्ञान के आलोक में देखने और समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जब कोई भारतीय संस्कृति की बात करता है, तो यह देखना होगा कि यह कोई भौगोलिक इकाई है या सीमा बंधन से मुक्त कोई वस्तुस्थिति। जैसे यदि इंडोनेशिया शब्द का अर्थ तलाशा जाए तो इसका अर्थ भारत का द्वीप होता है। वेस्टइंडीज से रेड इंडियंस के बोध स्वाभाविक रूप से होता है। प्रो. भारद्वाज ने आगे कहा कि चीन, रोम, फ्रांस आदि साम्राज्यों को बनते और मिटते हुए विश्व ने देखा है। भारत की ओर विश्व बड़ी उम्मीद से इसीलिए देख रहा है। यह समय भारत का है। भारत विश्व की एक मात्र जीवित प्राचीनतम सभ्यता है। उन्होंने हिंसा के विविध के रूपों का वर्णन करते हुए कहा कि भारत की अखण्डता के लिए सत्य व अहिंसा के रूप में सबसे बडी शक्ति है। 

विश्व के लिए भारत अनिवार्य है :-

इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड ने कहा कि भारत की अखण्डता, सम्प्रभुता एव सामर्थ्य का आधार हमारा सांस्कृतिक वैभव है। उन्होंने जैन दर्शन के आधार पर भारत की प्राचीन संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन और अर्वाचीन की यही शक्ति यह प्रमाणित कर रही है कि विश्व के लिए भारत अनिवार्य है। मानवता और मानवीय मूल्यों के विकास के लिए विश्व की निर्भरता का केंद्र भारत ही होने जा रहा है, जैसा यह पहले था। 

इससे पूर्व जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म दर्शन विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए विभागीय गतिविधियों को रेखांकित किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुमुक्षु बहनों के मंगल संगान से किया गया। प्रारम्भ में शोधार्थी अच्युतकांत जैन ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में मुख्यवक्ता प्रो. संजय भारद्वाज का कुलपति प्रो. दूगड़ ने शॉल, मोमेन्टो व साहित्य भेंटकर अभिनंदन किया। कार्यक्रम का संयोजन प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने किया। अंत में प्रो. नलिन के. शास्त्री ने आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर पुलिस उप-अधिक्षक राजेश ढाका, केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार के डॉ. जुगलकिशोर दाधीच, प्रो. रेखा तिवाडी, डॉ. प्रद्युम्नसिंह शेखावत सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

रिपोर्ट : जगदीश यायावर 

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