UEM जयपुर परिसर बना शैवाल-आधारित एयर प्यूरीफायर स्थापित करने वाला भारत का पहला विश्वविद्यालय

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संस्कार सृजन @ राम गोपाल सैनी 

जयपुर (संस्कार सृजन) पर्यावरण संधारणीयता और विद्यार्थियों के स्वास्थ्य व कल्याण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए, यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट (UEM), जयपुर आधिकारिक तौर पर अपने विद्यार्थियों, प्राध्यापकों और कर्मचारियों के लिए एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण प्रदान करने के उद्देश्य से परिसर में जैविक वायु शोधन प्रणाली (बायोलॉजिकल एयर प्यूरीफिकेशन सिस्टम) विकसित और स्थापित करने वाला भारत का पहला विश्वविद्यालय बन गया है। 

राष्ट्रीय अभियंता दिवस (इंजीनियर्स डे) के अवसर पर अनावरित यह अभूतपूर्व प्रणाली—जिसका नाम “द माइक्रो-ट्री” (The Micro-Tree) रखा गया है—एक उच्च-दर जैविक फोटोबायोरिएक्टर है, जो जीवित सूक्ष्म शैवाल (माइक्रोएल्गी) के माध्यम से परिवेशीय कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करता है, धूल-कणों (पार्टिकुलेट मैटर) को छानता है और पूरे परिसर में लगातार ताज़ी ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है।

सेंटर फॉर सस्टेनेबल इनोवेशंस फॉर क्लीन फ्यूचर (SICF), UEM जयपुर के तत्वावधान में विकसित “द माइक्रो-ट्री” विश्वविद्यालय की एक स्व-विकसित बौद्धिक संपदा (प्रोपराइटरी टेक्नोलॉजी) है। इस प्रणाली की परिकल्पना, इंजीनियरिंग और निर्माण डॉ. मनदीप सिंह (जिन्हें “द एल्गीमैन” के नाम से भी जाना जाता है), और उनके विद्यार्थियों केशव गोयल एवं सुनील लाम्बा द्वारा किया गया है। 

यह 300 लीटर क्षमता वाला एक अनुकूलित आउटडोर और सेमी-आउटडोर फोटोबायोरिएक्टर है, जो स्पिरुलिना प्लैटेंसिस (Spirulina platensis) नामक सूक्ष्म शैवाल द्वारा संचालित होता है। जैविक प्रकाश संश्लेषण (बायोलॉजिकल फोटोसिंथेसिस) के माध्यम से यह प्रणाली कार्बन डाइऑक्साइड का उपभोग करती है और ऑक्सीजन उत्पन्न करती है, जो यह दर्शाती है कि कैसे जैविक प्रक्रियाओं को इंजीनियरिंग के साथ एकीकृत करके सुगठित और संधारणीय पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियों का निर्माण किया जा सकता है।

SICF टीम के अनुसार, “द माइक्रो-ट्री” प्रतिदिन लगभग 110 ग्राम CO2 (लगभग 56 लीटर CO2 के बराबर) को ऑफसेट करता है, जिसके परिणामस्वरूप सालाना 40.15 किलोग्राम से अधिक CO2 (लगभग 20,440 लीटर) का शुद्ध कार्बन ऑफसेट प्राप्त होता है। इसके साथ ही, यह प्रणाली प्रतिदिन लगभग 80 ग्राम ऑक्सीजन (लगभग 56 लीटर) उत्पन्न करती है, जिससे प्रति माह लगभग 1,680 लीटर और प्रति वर्ष 20,440 लीटर से अधिक ऑक्सीजन का उत्पादन होता है। यह जैविक प्रक्रिया पारंपरिक डिस्पोजेबल मैकेनिकल फिल्टरों से उत्पन्न होने वाले कचरे से भी पूरी तरह मुक्त रखती है।

यह तकनीक पीपल के वृक्ष (Ficus religiosa) के पारिस्थितिक कार्यों से प्रेरित है। जहां एक प्राकृतिक पीपल के पेड़ को सालाना ~40 किलोग्राम CO2 सोखने के लिए विकसित होने में 10 से 12 वर्ष का समय लगता है, वहीं “द माइक्रो-ट्री” 1 वर्ग मीटर (1 m2) से भी कम के सीमित और इंजीनियरड स्थान में तुरंत वही समान पारिस्थितिक प्रभाव प्रदान करता है। UEM जयपुर ने “द माइक्रो-ट्री” के कार्बन शमन और ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता को एक परिपक्व पीपल के पेड़ के चुनिंदा पर्यावरणीय कार्यों के समकक्ष रेखांकित किया है, जिसे इस सुगठित इंस्टॉलेशन के माध्यम से साकार किया गया है।

इस परियोजना को माननीय निदेशक प्रो. सत्यजीत चक्रवर्ती, कुलपति प्रो. बिश्वजय चटर्जी तथा कुलसचिव एवं प्रोवोस्ट प्रो. प्रदीप कुमार शर्मा का निरंतर मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग प्राप्त हुआ है। उनके प्रोत्साहन ने शोध दल को इस स्वच्छ-तकनीक (क्लीन-टेक) अनुसंधान को परिसर में एक कार्यात्मक इंस्टॉलेशन में बदलने में सक्षम बनाया है।

सक्रिय पर्यावरणीय सुधार के अलावा, “द माइक्रो-ट्री” इंजीनियरिंग छात्रों के लिए एक संवादात्मक अनुसंधान एवं व्यावहारिक प्रदर्शन मंच के रूप में भी कार्य करता है; जो कक्षा के सैद्धांतिक ज्ञान को मैकेनिकल थर्मो-फ्लूइड्स, स्वचालित IoT मॉनिटरिंग और बायोकेमिकल सर्कुलर इंजीनियरिंग के व्यावहारिक अनुप्रयोगों से जोड़ता है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ, UEM जयपुर नेट-ज़ीरो परिसर पहलों, स्वदेशी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और एक स्वस्थ शैक्षणिक परिवेश के प्रति अपनी संस्थागत प्रतिबद्धता को पुनः दोहराता है। “आइए, मिलकर ताज़ी हवा उगाएं!” (Let’s Grow Fresh Air Together!)

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