गर्भावस्था में ऐसे बदलता है शरीर, जानें हर तिमाही पर बरतनी है क्या-क्या सावधानियां

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संस्कार सृजन राम गोपाल सैनी

जयपुर (संस्कार सृजन) गर्भावस्था नौ महीने की एक एक जटिल यात्रा होती है, जिसमें गर्भवती महिला कई तरह के शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक बदलावों से गुजरती है। इसमें तीन पड़ाव होते हैं, जिन्हें पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही कहा जाता है। प्रत्येक तिमाही के दौरान शरीर अलग-अलग बदलावों से गुजरता है। हर तिमाही में होने वाले इन बदलावों का सामना कैसे करें, आइए जानें:

सबसे संवेदनशील है पहली तिमाही :-

गर्भावस्था की पहली तिमाही यानी एक से 12 सप्ताह के दौरान शारीरिक बदलाव अधिक स्पष्ट नहीं होते। लेकिन पहली तिमाही सबसे संवेदनशील होती है, क्योंकि इस दौरान लगभग 25 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को गर्भपात का सामना करना पड़ता है। इस दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं:

थकान और हार्मोन संबंधी बदलाव: -

प्रेग्नेंसी के दौरान प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन के बढ़ते स्तर से आपको असामान्य रूप से थकान महसूस हो सकती है। यह हार्मोन गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायता करता है, लेकिन यह मेटाबॉलिज्म को भी धीमा कर देता है, जिससे आराम करना जरूरी हो जाता है। इस बदलाव का सामना करने के लिए रात में पूरी नींद और दोपहर में थोड़ी देर झपकी लें। स्नैक्स में फल और सूखे मेवे खाएं। पानी और तरल पदार्थों के सेवन में कोताही न बरतें।

मॉर्निंग सिकनेस:- 

प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में सुबह उठने के बाद कमजोरी महसूस होना, चक्कर आना और मतली आने की समस्या होना आम समस्या है। यह समस्या एचसीजी (ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन) हार्मोन का स्तर बढ़ने से होती है। इस बदलाव का सामना करने के लिए हल्के और सुपाच्य भोजन का सेवन करें। दिन में तीन बार भारी-भरकम खाना खाने की जगह पांच से छह बार कम-कम मात्रा में खाना खाएं। अदरक की चाय पिएं। डॉक्टर की सलाह से विटामिन बी-6 के सप्लीमेंट्स लें।

पाचन संबंधी परिवर्तन: -

हार्मोन संबंधी बदलावों के कारण पाचन मार्ग थोड़ा रिलैक्स हो जाता है, जिससे सूजन, गैस और कब्ज की समस्या भी इस वक्त हो सकती है। इस बदलाव का सामना करने के लिए फलों, सब्जियों और साबुत अनाज के साथ फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों की मात्रा आहार में बढ़ाएं। खूब पानी पिएं और शारीरिक रूप से सक्रिय रहें।

दूसरी तिमाही में लौट आती है ऊर्जा :-

गर्भावस्था की दूसरी तिमाही यानी 13-26 सप्ताह तक में शरीर में स्पष्ट बदलाव नजर आने लगते हैं, पर ऊर्जा का स्तर बढ़ जाता है। मॉर्निंग सिकनेस की समस्या भी कम हो जाती है। वहीं, दूसरी और तीसरी तिमाही में कई महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटीज की शिकार भी हो जाती हैं। 

इस दौरान शरीर में निम्न बदलाव आते हैं:-वजन बढ़ना और शरीर के आकार में बदलाव: दूसरी तिमाही में वजन लगातार बढ़ना शुरू हो जाता है। गर्भाशय का आकार बढ़ने से पेट फैलने लगता है। इस बदलाव का सामना करने के लिए पौष्टिक खाद्य पदार्थों का सेवन करें। सक्रिय रहने और वजन को नियंत्रित करने के लिए हल्के प्रसवपूर्व व्यायाम (जैसे चलना, स्ट्रेचिंग या प्रसवपूर्व योग) शुरू करें।

त्वचा में बदलाव: -

इस दौरान पेट के नीचे एक काली रेखा (लिनिया निग्रा), चेहरे पर पिग्मेंटेशन या पेट पर स्ट्रेच मार्क्स दिख सकते हैं। इस बदलाव का सामना करने के लिए रूखेपन और खुजली को कम करने के लिए खुशबू रहित मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल करें। मेलास्मा के लिए सनस्क्रीन लगाएं।

पीठ दर्द और पॉस्चर में बदलाव:- 

पेट का बढ़ता आकार आपके गुरुत्वाकर्षण के केंद्र को बदल देता है और हार्मोन रिलैक्सिन जोड़ों को ढीला कर देता है। इस बदलाव का सामना करने के लिए अपना पॉस्चर ठीक रखें। ऐसे जूते पहनें जो पैरों को सपोर्ट दें। प्री-नैटल मसाज कराएं। अपने शरीर की जरूरत के हिसाब से एक्सरसाइज प्लान तैयार करें।

तीसरी तिमाही में सबसे ज्यादा बदलाव :-

गर्भावस्था की तीसरी तिमाही यानी 27-40 सप्ताह के दौरान शारीरिक बदलाव चरम पर होते हैं। यह वह समय होता है, जब एक गर्भवती महिला का शरीर प्रसव और स्तनपान के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर रहा होता है। इस दौरान शरीर में निम्न बदलाव आते हैं:-

सांस फूलना: - जैसे-जैसे गर्भाशय फैलता है, वह फेफड़ों और डायाफ्राम पर दबाव डाल सकता है, जिससे गहरी सांस लेना मुश्किल हो जाता है। 

बढ़ता भ्रूण :- मूत्राशय और पेल्विक फ्लोर पर दबाव डालता है। इस बदलाव का सामना करने के लिए तकिये लगाकर बैठें और सोएं। प्रसव और प्रसवोत्तर स्वास्थ्य लाभ के लिए मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए पेल्विक फ्लोर व्यायाम (कीगल) का अभ्यास करें।

सूजन और रक्त संचार संबंधी समस्याएं: -

शरीर में रक्त की मात्रा बढ़ने और तरल पदार्थ ज्यादा मात्रा में इकट्ठा होने से पैरों, टखनों और हाथों में सूजन महसूस हो सकती है। इनसे बचने के लिए पैरों को लटकाकर न बैठें। पैरों के नीचे सपोर्ट के लिए कुछ रखें। ढीले कपड़े पहनें और जरूरत पड़ने पर कम्प्रेशन मोजे पहनें। डिहाइड्रेशन से बचें।

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